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उड़द की खेती, उन्नत तरीके से करे, कैसे करे उड़द की खेती 2021

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उड़द की खेती का सामान्य परिचय

उड़द एक प्रमुख दलहनी फसल है, जो कि कम अवधि में पक कर तैयार हो जाती है | अतः असिंचित क्षत्रों में भी उड़द की खेती सुगमतापूर्वक की जा सकती है | उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश की सिंचित क्षेत्र में अल्पावधि (60-65 दिन) वाली दलहनी फसल उड़द की खेती करके किसानों की वार्षिक आय में आशातीत वृद्धि संभव है | साथ ही मृदा संरक्षण / उर्वरता को भी बढ़ावा दिया जा सकता है | इसके दाने में 24% प्रोटीन, 60% कर्बोहाईट्रेट व 1.3% वसा पाई जाती है | उड़द की ग्रीष्मकालीन फसल में पीत चितकबरा रोग भी खरीफ फसल की अपेक्षा कम लगता है |

उड़द की खेती के लिए मिट्टी

बलुई, दोमट भूमि, जिसमे पानी न भरता हो इसकी खेती के लिए उपयुक्त है | जल जमाव वाले क्षेत्र इस फसल के लिए उपयुक्त नहीं है | उड़द के लिए मिट्टी की पी-एच. 7-8 के बीच उपयुक्त मानी जाती है | उड़द मिट्टी में नाइट्रोजन को स्थिर कर कार्बनिक पदार्थ की मात्रा को भी बढ़ाने में मदद करती है | उड़द की खेती विभिन्न प्रकार की भूमि में होती है | हल्की रेतीली, दोमट व मध्यम प्रकार की भूमि जिसमे पानी का निकास अच्छा हो उड़द के लिए अधिक उपयुक्त होती है | पी.एच.मान 6.5-7.8 के बीच वाली भूमि उड़द के लिए उपयुक्त होती है | वर्षा आरम्भ होने के बाद  दो-तीन बार हल या बखर चलाकर खेत को समतल करें | वर्षा आरम्भ होने के पहले बोनी करने से बढ़वार अच्छी होती है |  

उड़द की खेती के लिए उन्नत प्रजातियाँ

उन्नत प्रभेदबुवाई का समयपरिवक्वता अवधिऔसत अपज
टी.9, पंत उरद 30, पंत उरद 31, शेखर15-31 जुलाई90-95 दिन10-12 क्विंटल / हेक्टेयर
नवीन1 अगस्त-10 सितम्बर85-90 दिन10-12 क्विंटल / हेक्टेयर
उरद की किस्म

उरद की खेती से पहले बीज उपचार

उड़द की खेती में बीजोपचार
उड़द का बीज

उड़द बीज का थीरम 2 ग्राम एवं कार्बेन्डाजिम 1.0 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करके बीज बोयें | साथ ही साथ राइजोबियम कल्चर से भी उपचार चाहिए | राइजोबियम कल्चर उड़द, मूंग एवं अन्य दलहनी फसलों को वायुमण्डली नाइट्रोजन उपलब्ध कराने में सहायता करती है | कल्चर की लगभग 200 ग्राम मात्रा का एक पैकेट, 10 किलोग्राम बीज को उपचारित करने के लिए पर्याप्त होती है |

बीज को स्वच्छ पानी से हल्का गीला कर कल्चर को बीज में अच्छी प्रकार से मिला दें जिससे बीज के ऊपर कल्चर की एक समान परत चिपक जाये | बीजोपचार के पश्चात् बीज की बुवाई तुरंत कर देनी चाहिए | राइजोबियम कल्चर का एक पैकेट (250 ग्राम) प्रति 10 किलोग्राम बीज के लिए पर्याप्त होता है |

50 ग्राम गुण या शक्कर 1/2 लीटर पानी में घोलकर उबालें व ठण्डा कर लें | ठण्डा हो जाने पर ही इस घोल में एक पैकेट राइजोबियम कल्चर मिला लें | बाल्टी में 10 किलोग्राम बीज डालकर अच्छी तरह से मिला लें ताकि कल्चर के लेप सभी बीजों पर चिपक जाएँ उपचारित बीजों का 8-10 घण्टे तक छायाँ में फेला देते हैं |

उपचारित बीज को धूप में नहीं सुखाना चाहिए | बीज उपचार दोपहर में करें ताकि शाम को अथवा दुसरे दिन बुआई की जा सके | कवकनाशी या कीटनाशी आदि का प्रयोग करने पर राइजोबियम कल्चर की दुगनी मात्रा का प्रयोग करना चाहिए तथा बीजोपचार कवकनाशी-कीटनाशी एवं राइजोबियम कल्चर के क्रम में ही करना चाहिए |  

उड़द की खेती के लिए बुआई की विधि एवं बीज दर

बुवाई कैसे करे उड़द की खेती में
उड़द की बुवाई

उड़द की बुआई लाईनमें हल पीछे करें | लाईन से लाईन की दूरी 30-45 से.मी. एवं बुआई की गहराई 3-4 से.मी. होनी चाहिए | एक हेक्टेयर खेती की बुआई के लिए 12-15 किलोग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है | बुआई पंक्तियों में ही सीडड्रिल या देशी हल के पीछे नाई या चोंगा बांधकर करते हैं | बोनी नारी विधि से करे | ग्रीष्म ऋतू में अधिक तापक्रम के कारण फसल वृद्धि कम होती है | कतारों की दूरी 30 से.मी. तथा पौधों से पौधों की दूरी 10 से.मी. रखें तथा बीज 4-6 से.मी. की गहराई पर बोयें |   

उड़द की खेती में उर्वरकों का प्रयोग

उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना चाहिए | यदि परिक्षण की सुविधा उपलब्ध न हो तो 15 किलोग्राम नाइट्रोजन तथा 40 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टेयर करना चाहिए | उर्वरकों की सम्पूर्ण मात्रा अंतिम जुलाई के समय हल के पीछे कूंडों में प्रयोग करें | फास्फोरस की मात्रा सिंगल सुपर फास्फेट के रूप में प्रयोग करने पर अधिक लाभ होता है |एकल फसल के लिए 15 से 20 किलोग्रामनाइट्रोजन, 40 से 50 किलोग्राम फास्फोरस, 30 से 40 ग्राम पोटाश, प्रति हेक्टेयर की दर से अंतिम जुताई के समय खेत में मिला देना चाहिए |

उर्वरकों की मात्रा मृदा परिक्षण के आधार पर देना चाहिए | नाइट्रोजन एवं फास्फोरस की पूर्ति के लिए 100 किलोग्राम डी.ए.पी. प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए | उर्वरकों को अंतिम जुताई के समय ही बीज से 5-7 से.मी. की गहराई व 3-4 से.मी. साइड पर ही प्रयोग करना चाहिए |

उड़द की खेती में निराई-गुड़ाई

बुआई के बाद तीसरे या चौथे सप्ताह में पहली निराई-गुड़ाई तथा आवश्यकतानुसार दूसरी निराई बुआई के 40-50 दिन बाद करना चाहिए | घास तथा चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को रासायनिक विधि से नष्ट करने के लिए फ्ल्यूक्लोरेलिन (45 ई.सी.) की 2.0 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से आवश्यक पानी में मिलाकर बुआई के पहले भूमि पर छिड़काव करके मिट्टी में मिला दें अथवा पेन्डिथिलीन 30 ई.सी. 3.3 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 800-1000 लीटर पानी में घोल का बुआई के तुरंत बाद जमाव से पूर्व छिड़काव करें |

उड़द में सिंचाई कैसे करे ?

यह वर्षा ऋतू की फसल है | इसलिए इसमें अलग से सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है | वर्षा नहीं होने की स्थिति में एक हल्की सिंचाई करनी चाहिए | सामान्यत: खरीफ की फसल को सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है | यदि वर्षा का अभाव हो तो एक सिंचाई फलियाँ बनते समय अवश्य देना चाहिए | उड़द की फसल को जायद में 3-4 सिंचाई की आवश्यकता होती है | प्रथम सिंचाई पलेवा के रूप में तथा अन्य सिंचाईयाग 15 से 20 दिन के अन्तराल में फसल की आवश्यकतानुसार करना चाहिए | पुष्पावस्था एवं दाने बनते समय खेत में उचित नमी होना अति आवश्यक है | स्प्रिंकलर सेट का उपयोग कर पानी सवर्धन एवं फसल के उत्पादन में अप्रत्याशित बढ़त प्राप्त की जा सकती है |

उड़द में खरपतवार नियंत्रण

बुवाई के 25 से 30 दिन बाद तक खरपतवार फसल को अत्यधिक नुकसान पहुंचाते है यदि खेत में खरपतवार अधिक है तो 20-25 दिन बाद एक निराई कर देना चाहिए | जिन खेतो में खरपतवार गम्भीर समस्या हो वहां पर बुआई से एक दो दिन पश्चात् पेंडीमिथालीन की 0.75-1.00 किलोग्राम सक्रीय मात्रा को 400-600 लीटर पानी में घोलकर एक हेक्टेयर में छिड़काव करना लाभप्रद रहता है |

उड़द में कीट एवं रोग नियंत्रण

तना मक्खी

सूंड़ियो द्वारा तने को खोखला अथवा सुरंग बनाकर नुकसान पहुँचाया जाता है, जिससे पौधे पीले पड़कर बाद में सुख जाते हैं | इसकी रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफास, डाईमेथोएट या मिथाइल डिमेटान में से किसी एक दवा का 1.0 मिली. मात्रा प्रति लीटर पानी की दर से फसल जमाव के एक सप्ताह बाद छिड़काव करें |

बिहार रोमिल सूड़ी

सूड़ियां पत्तो को खाकर नुकसान पहुँचाती है, से काले भूरे रोयेंदार सूड़ियाँ होती है | प्रौढ़ कीट पत्तियों पर समूह के अन्डे देते हैं | इसकी रोकथाम के लिए शुरू में पत्तियों पर दिए गये अंडो का नष्ट कर देना चाहिए | आवश्यकता हो तो क्विनालफास या ट्रायजोफास 2.0 मिली. अथवा फेनवैल्ररेट 1-2 मिली. प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें |

मत्कुण (बग्स), थ्रिप्स

थ्रिप्स और मत्कुणकीट (बग्स) फूल और फली बनते समय कलिकाओं पुष्पों और फलियों का रस चूसकर नुकसान पहुँचाते है | थ्रिप्स के नुकसान से फल गिर जाते हैं | मत्कुणों के प्रकोप से से दाने छोटे अथवा अविकसित होते है | इनकी रोकथाम हेतु मोनोक्रोटोफास, थायमेथोएट अथवा फेनवैलेरेट 1.0-1.5 मिली. प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर फसल के ऊपर फूल आते ही किसी एक दवा का 500-600 लीटर प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करें | मंडुवा, अरहर आदि के साथ सहफसली खेली  करना भी उपयोगी होता है |

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उड़द में रोग नियंत्रण

पीला चित्तवर्ण रोग

रोगी पत्तियों पर गाढ़े पीले सुनहरे पाये जाते हैं |उग्र अवस्था में सम्पूर्ण पत्ती पीली पड़ जाती है | साथ ही तना एवं फलियाँ भी पीली पड़ जाती है | यह रोग सफ़ेद मक्खी द्वारा फैलता है | इसके नियंत्रण हेतु डिइमिथोएट (30 ई.सी.) या मिथाइल-ओ-डिमेटर (25 ई.सी.) का भी एक  लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से किसी एक कीटनाशी के 2-3 छिड़काव 10-12 के अन्तराल पर 500-600 लीटर पानी में मिलाकर प्रयोग कर सकते है | रोम अवरोधी प्रजातियाँ, जैसे- पंत उड़द-19, पंत उड़द-35 तथा नरेंद्र उड़द-1 उगायें |

पत्तियों का सर्कोस्पोरा धब्बा रोग

 पत्तों पर गोलाई लिए हुए कोणीय धब्बे बनते है, जिनमे बीच का भाग हल्के राख के रंग का या हल्का भूरा या लाल सफेद रंग का हो जाता है | फलियों और तनों पर भी लक्षण दिखाई देते हैं | इसकी रोकथाम के लिए कॉपर आक्सीक्लोराइड या मैंकोजेब (0.2 प्रतिशत) या 500 ग्राम कार्बेन्डाजिम (0.05 प्रतिशत) या प्रोपोकोनाजोल (0.1 प्रतिशत) को 700-800 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें |

उड़द की कटाई

फसल बुआई के लगभग 80 से 90 दिनों बाद इसकी पत्तियों का रंग पीला पड़ने लगती है एवं फलियाँ सूचाने लगती है | अर्थात फसल पूर्णत: कटनी करने योग्य तैयार हो गयी है | इसके फलियों को सावधानी पूर्वक तुड़ाई कर लेना चाहिए |

उड़द की उपज

संस्तुत सघन पद्धतियों को अपनाकर यदि किसान भाई उड़द की खेती करते हों तो 10 से 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से इसकी उपज प्राप्त की जा सकती है | सामान्यत: यह देखा गया है कि अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन की पैदावार व स्थानी किस्मों की औसत उपज में लगभग 22% का अंतर है | यह अंतर कम करने के लिए अनुसंधान संस्थानों व कृषि विज्ञान केंद्र की अनुशंसा के अनुसार उन्नत कृषि तकनीक को अपनाना चाहिए | अच्छी प्रकार प्रबंधन की गई फसल से 12-15 क्विंटल / हेक्टेयर तक दाने की उपज मिल जाती है |

उड़द की खेती में अधिक उत्पादन लेने हेतु आवश्यक बिंदू

  • ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई तीन वर्ष में एक बार अवश्य करें |   
  • पोषक तत्वों की मात्रा मृदा परिक्षण के आधार पर ही दें |
  • बुआई पूर्व बीजोपचार अवश्य करें |
  • खरीफ में बुआई के लिए रिज-फरो विधि अपनाएं |
  • पीला मोजेक रोग रोधी किस्में: आई.पी.यू.-94-1 (उतरा), शेखर-3 (के.यू.-309), उजाला (ओ.बी.जे.-17),  वी.बी.एन. (बी.जी.)-7, प्रताप उड़द-1 का चुनाव क्षेत्र की अनुकूलता के अनुसार करें |
  • पौध संरक्षण के लिए एकीकृत पौध संरक्षण के उपायों को अपनाना चाहिए | खरपतवार नियंत्रण अवश्य करें |
  • तकनिकी जानकारी हेतु अपने जिले / नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से सम्पर्क करें |
  • भारत सरकार एवं राज्य सरकार द्वारा फसल उत्पादन (जुताई, खाद, बीज, सूक्ष्म पोषक तत्व, कीटनाशी, सिंचाई के साधनों), कृषि यंत्रो, भण्डारण इत्यादि हेतु दी जाने वाली सुविधाएँ / अनुदान सहायता / लाभ की जानकारी हेतु संबंधित राज्य / जिला विकास खण्ड स्थित कृषि विभाग से संम्पर्क करें | 
उड़द की खेती का विडियो

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