तरबूज की खेती

तरबूज की खेती | तरबूज की वैज्ञानिक खेती करके पाए मुनाफा 2021

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तरबूज की खेती का एक सामान्य परिचय

गर्मी के दिनों में तरबूज एक अत्यन्त लोकप्रिय सब्जी मानी जाती है |इसके फल पकने पर काफी मीठे एवं स्वादिष्ट होते हैं | तरबूज की खेती हिमालय के तराई क्षेत्रों से लेकर दक्षिण भारत के रज्यो तक विस्तृत रूप में की जाती है | इसके फलों के सेवन से “लू” नहीं लगती है तथा गर्मी से राहत मिलती है | इसके रस को नमक के साथ प्रोयग करने पर मुत्राशय में होने वाले रोगों से आराम मिलता है | इसकी खेती मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, कर्नाटक एवं राजस्थान में की जाती है |

तरबूज की खेती के लिए जलवायु

गर्म एवं औसत आर्द्रता वाले क्षेत्र इसकी खेती के लिए सर्वोत्तम होते है | बीज के जमाव व् पौधों के बढ़वार के लिए 25-32 डिग्री सैल्शियास तापक्रम उपयुक्त पाया गया है |

तरबूज की खेती के लिए भूमि एवं भूमि की तैयारी

तरबूज की खेती विभिन्न प्रकार की भूमि में की जाती है | लेकिन बलुई मिट्टी इसकी खेती के लिए उपयुक्त होती है | तरबूज, कददू फल की सब्जियों में एक ऐसी सब्जी है जिसकी खेती 5 पी.एच.मान मृदा अम्लता पर भी सफलतापूर्वक की जाती है | भूमि का पी.एच.मान 5.5 से 7 तक होना चाहिए | पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा बाद की जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करते हैं | पानी कम या ज्यादा न लगें इसके लिए खेत को समतल कर लेते हैं | नदियों के किनारे बलुई मिट्टी में पानी की उपलब्धता के आधार पर नालियों एवं थालो को बनाया जाता है और नालियों या थालों को सड़ी हुई गोबर की खाद और मिट्टी की मिश्रण से भर देते हैं |

तरबूज की किस्म

तरबूज की उन्नत किस्में

सुगर बेबी

इसकी बेलें औसत लम्बाई की होती हैं और फलों का औसत वजन 2 से 5 किलोग्राम तक होता है | फल का ऊपरी छिलका गहरे हरे रंग का और उन पर धूमिल सी धारियां होती है | फल का आकार गोल तथा गूदे का रंग गहरा लाल होता है | इसके फलों में 11-13 प्रतिशत टी.एस.एस. होता है | यह शीघ्र पकने वाली प्रजाति है | बीज छोटे, भूरे रंग के होते हैं | जिनका शिरा काला होता है | औसत पैदावार 400-450 कुन्तल / हैक्टेयर है | इस किस्म को पककर तैयार होने में लगभग 85 दिन लगते हैं |

दुर्गापुर केसर

यह देर से पकने वाली किस्म है, तना 3 मीटर लम्बे, फलों का औसत वजन 6-8 किलोग्राम, गूदे का रंग पीला तथा छिलका हरे रंग का व धारीदार होता है | बीज बड़े व पीले रंग के होते हैं | इसकी औसत उपज 350-450 कुन्तल प्रति हैक्टेयर होती है |

अर्का मानिक

इस किस्म के फल गोल, अण्डाकार व छिलका हरा जिस पर गहरी हरी धारियां होती हैं तथा गूदा गुलाबी रंग का होता है | औसत फल वजन 6 किलोग्राम, मिठास 12-15 प्रतिशत एवं गूदा सुगन्धित होता है | फलों में बीज एक पंक्ति में लगे रहते हैं | जिससे खाने में काफी सुविधा होती है | इसकी भण्डारण एवं परिवहन क्षमता अच्छी होती है | यह चूर्णित आसिता, मृदुरोमिल आसिता एवं एन्थ्रेक्नोज रोग के प्रति अवरोधी है | औसत उपज 500 कुन्तल प्रति हैक्टेयर 110-115 दिन में प्राप्त की जा सकती है |

दुर्गापुर मीठा

इस किस्म का फल गोल हल्का हरा होता है | फल का औसत वजन 7-8 किलोग्राम तथा मीठास 11 प्रतिशत होती है | इसकी औसत उपज 400-500 कुन्तल / हेक्टेयर होती है | इस किस्म को तैयार होने में लगभग 125 दिन लगते हैं |

काशी पीताम्बर

इसके फल गोल, अण्डाकार व छिलका पीले रंग का होता है तथा गूदा गुलाबी रंग का होता है औसत फल वजन 2.5 से 3.5 किलोग्राम होता हैं औसत उपज 400-450 कुन्तल / हेक्टेयर होती है |

तरबूज की खेती में उसका फल
तरबूज फल

तरबूज की खेती में खाद एवं उर्वरक

इसकी खेती के लिए 65 किलोग्राम नाइट्रोजन 56 किलोग्राम फास्फोरस तथा 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से अवश्य दी जानी चाहिए | नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटास की पुरी मात्रा खेत में नालियाँ या थाले बनाते समय देते हैं | नाइट्रोजन की आधी मात्रा दो बराबर भागो में बाँटकर खड़ी फसल में जड़ों के पास गुड़ाई के समय तथा पुनः 45 दिन बाद छिड़ककर देना चाहिए |

तरबूज के बुवाई का समय  

उत्तर भारत की मैदानी क्षेत्रों में तरबूज की बुवाई 10-20 फरवरी के बीच में की जाती है, जबकि नदियों के किनारे इसकी बुआई नवम्बर-जनवरी के बीच में की जाती है | दक्षिणी पश्चिमी राजस्थान में मतीरा जाति की तरबूज की बुवाई जुलाई महीने में की जाती है | जबकि दक्षिणी भारत में इसकी बुवाई अगस्त से लेकर जनवरी तक करते हैं |

तरबूज की बीज की मात्रा

एक हेक्टेयर क्षेत्रफल के लिए 3.5-4 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है |

तरबूज के बुआई की विधि

तरबूज की बुआई मेड़ों पर 2.5 से 3.0 मीटर की दूरी पर 40 से 50 से.मी. चौड़ी नाली बनाकर करते हैं | इस नालियों के दोनों किनारों पर 60 से.मी. की दूरी पर बीज बोतें हैं | यह दूरी मृदा की उर्वरता एवं प्रजाति के अनुसार घट बढ़ सकती हैं | नदियों के किनारे 60X60X60 से.मी.क्षेत्रफल वाले गड्डे बनाकर उसमे 1:1:1: के अनुपात में मिट्टी गोबर की खाद तथा बालू का मिश्रण भरकर थाले को भर देवें तत्पश्चात प्रत्येक थाले में दो बीज लगाते हैं |

तरबूज की खेती के लिए सिंचाई

यदि तरबूज की खेती नदियों के कछारों में की जाती है तब सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि पौधों की जड़े बालू के निचे उपलब्ध पानी को शोषित करती रहती है | जब मैदानी भागो में इसकी खेती की जाती, तो सिंचाई 7-10 दिन के अंतराल पर करते हैं | जब तरबूज आकार में पुरी तरह से बढ़ जाते हैं सिंचाई बंद कर देते हैं, क्योंकि फल पकते समय खेत में पानी अधिक होने से फल में मीठास कम हो जाती है और फल फटने लगते हैं |

तरबूज फोटो
ताजे तरबूज

तरबूज की खेती में खरपतवार नियंत्रण

तरबूज के जमाव से लेकर प्रथम 25 दिनों तक खरपतवार फसल को ज्यादा नुकसान पहुँचाते हैं | इससे फसल की वृद्धि पर प्रतिकूल असर पड़ता है तथा पौधों की बढ़वार रुक जाती है | अतः खेत से कम से कम दो बार खरपतवार निकलना चाहिए | रासायनिक खरपतवारनाशी के रूप में बूटाक्लोर रसायन 2 किलोग्राम प्रति हेक्टयेर की दर से बीज बुआई के तुरंत बाद छिड़काव करते हैं | खरपतवार निकालने के बाद खेत की गुड़ाई करके जड़ों के पास मिट्टी चढ़ाते हैं जिससे पौधों का विकास तेजी से होता है |

 तरबूज की तुड़ाई एवं उपज

तरबूज में तुड़ाई बहुत महत्वपूर्ण है | तरबूज के फल का आकार एवं डंठल के रंग को देखकर उसके पकने की स्थिति का पता लगाना बड़ा मुश्किल है | अच्छी प्रकार पके हुए फलों की पहचान निम्न प्रकार से की जाती है | जमीन से सटे हुए फल के भाग का रंग परिवर्तन देखकर (फल का रंग सफेद से मखनियां पीले रंग) किया जाता है |

पके फले को थपथपाने से धब-धब की आवाज आती है तो फल पका होता है | इसके अलावा यदि फल से लगी हुई प्ररोह पूरी तरह सुख जाये तो फल पका होता है | पके हुए फल को दबाने पर कुरमुरा एवं फटने जैसा अनुभव हो तो भी फल पका माना जाता है | फलों को तोड़कर ठण्डे स्थान पर एकत्र करना चाहिए | दूर के बाजारों में फल को भेजते समय कई सतहों में ट्रक में रखते हैं और प्रत्येक सतह के बाद धान की पुआल रखते हैं | इससे फल आपस में रगड़कर नष्ट नहीं होते है और तरबूजों की ताजगी बनी रहती है |

गर्मी के दिनों में सामान्य तापमान पर फल को 10 दिनों तक आसानी से रखा जा सकता है | औसतन तरबूज की उपज 400-500 कुन्तल प्रति हेक्टेयर होती है |

तरबूज की खेती मे तरबूज का उत्पादन
तरबूज का फल

तरबूज के प्रमुख कीट एवं नियंत्रण

1.     कददू का लाल कीट (रेड पम्पकिन बिटिल)

इस कीट का वयस्क चमकीली नारंगी रंग का होता हैं तथा सिर, वृक्ष एवं उदार का निचला भाग काला होता है | सूण्ड़ी जमीन के अन्दर पायी जाती है | इसकी सूण्ड़ी वयस्क दोनों क्षति पहुँचाते हैं | प्रौढ़ पौधों की छोटी पत्तियों पर ज्यादा क्षति पहुँचाते हैं | ग्रब (इल्ली) जमीन में रहती है जो पौधों की जड़ पर आक्रमण कर हानि पहुँचाती है | ये कीट जनवरी से मार्च के महीनों में सबसे अधिक सक्रीय होती है | अक्टूबर तक खेत में इनका प्रकोप रहता है | फसलो के बीज पत्र एवं 4-5 पत्ती अवस्था इन कीटों के आक्रमण के लिए सबसे अनुकूल है | प्रौढ़ कीट विशेषकर मुलायम पत्तियां अधिक पसंद करते है |अधिक आक्रमण होने से पौधे पत्ती रहित हो जाते है |

नियंत्रण

सुबह ओस पड़ने के समय राख का बुरकाव करने से भी प्रौढ़ पौधों पर नहीं बैठता जिससे नुकसान कम होता है | जैविक विधि से नियंत्रण के लिए आजादीरैक्टिन 300 पीपीएम, 5-10 मिली / लीटर आजादीरैक्टिन 5 प्रतिशत, 0.5 मिली / लीटर की दर से दो या तीन छिड़काव करने से लाभ होता है | इस कीट का अधिक प्रकोप होने पर कीटनाशी जैसे डाईक्लोरोवास 76 ईसी. 1.25 मिली / लीटर या ट्राइक्लोरोफेरान 50 ईसी. 1 मिली / लीटर की दर से 10 दिनों के अन्तराल पर पर्णीय छिड़काव करें |

तरबूज के प्रमुख रोग एवं नियंत्रण

मृदुरोमिल आसिता

जब तापमान 20-22 डिग्री से.ग्रे. हो, तब यह रोग तेजी से फैलता है | उत्तरी भारत में इस रोग का प्रकोप अधिक है | इस रोग का मुख्य लक्षण पत्तियों पर कोणीय धब्बे जो शिराओ द्वारा होते हैं | अधिक आर्द्रता होने पर पत्ती की निचली सतह पर मृदुरोमिल कवक की वृद्धि दिखाई देती है |

नियंत्रण

इसकी रोकथाम के लिए मैंकोजेब 0.20 प्रतिशत (2.5 ग्राम / लीटर पानी) घोल से पहले सुरक्षा के रूप में छिड़काव बीमारी दिखने तुरंत करना चाहिए | यदि पौधों पर बीमारी के लक्षण दिखाई दे रहे हो तो मेटल एक्सिल 8 प्रतिशत + मैंकोजेब 64 प्रतिशत डब्लू.वी.पी. (25 प्रतिशत) दवा का छिड़काव 7 दिन के अन्तराल पर 3-4 बार करना चाहिए | पुरी तरह रोगग्रस्त लताओं को निकाल कर जला देना चाहिए तथा बीज उत्पादन के लिए गर्मी की फसल से बीज उत्पादन करें |

तरबूज बड निक्रोसिस

यह रोग रस द्रव्य एवं थ्रिप्स कीट द्वारा फैलता है | रोग ग्रस्त पौधों में क्राउन से अत्यधिक कल्ले निकलते हैं और तना सामान्य से कड़ा और ऊपर उठा हुआ दिखाई देता है, पत्तियां विकृत हो जाती हैं उसमें असामान्य वृद्धि होती है तथा फूल भी टेढ़े-मेढ़े एवं हरे हो जाते हैं |

नियंत्रण

इस रोग से बचाव हेतु रोग रोधी किस्म की बुवाई करें तथा रोगी पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर देवें | बीज अथवा पौधों को इमिडाक्लोरोप्रिड 0.3 मि.ली. दवा 1 लीटर पानी में घोलकर रोपाई अथवा बोआई से पहले 10 मिनट तक उपचारित करें | पौध जमाव के 10-15 दिन के बाद से नीम अथवा पुंगगामिया के रस का छिड़काव तीन प्रतिशत की दर से 15 दिन के अन्तराल पर करना चाहिए | 

तरबूज की खेती के लिए नयी विधि

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