स्टीविया की खेती कैसे करे

स्टीविया की खेती | वैज्ञानिक तरीके से करें | पूरी जानकारी |

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स्टीविया की खेती परिचय

स्टीविया की खेती में व्यक्ति की अनियमित दिनचर्या एवं खानपान से विभिन्न प्रकार की बीमारियों का प्रसार तीव्र गति से होता जा रहा है जिसमे मधुमेह एक प्रमुख बीमारी के रूप में उभरी है | चिकित्सा विज्ञान के के अनुसार आने वाले समय में आबादी का एक बड़ा इस्सा इसकी चपेट में आ सकता है | इसलिए आवश्यक हो जाता है कि इसके लिए अभी से उपाय खोजे जायें जो कारगर हो सकें |

जिसके लिए विशेषकर मधुमेह रोगियों के लिए शक्कर पूर्ति हेतु स्टीविया लाभदायक साबित हो चूका है | स्टीविया के पत्तों में मिठास उत्पन्न करने वाले तत्व होते हैं जिन्हें स्टीवियोसाइड एवं ग्लूकोसाइड के नाम से जाना जाता है | इसके अलावा इनमे 6 और तत्व होते हैं जिनमें इन्सुलिन को संतुलित करने का गुण होता है |

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इसकी मिठास टेबुल सुगर से ढाई सौ गुना एवं सुक्रोस से तीन सौ गुना अधिक होती है | इसमें कृत्रिम मिठास उत्पन्न करने वाले अन्य कई पदार्थो का विकल्प बनने की अच्छी सम्भावनाएं हैं | अभी तक स्टीविया उत्पादों के उपयोग से मनुष्य पर किसी भी प्रकार का विपरीत प्रभाव पड़ने की शिकायत नहीं पाई है |

यह कैलोरी और झागहीन होता है तथा पकाने पर डार्क भी नहीं पड़ता | स्टीवियोसाइड पत्ती में उनके वजन के अनुसार 3 से 10 प्रतिशत तक होता है स्टीवियोसाइड में से ग्लूकोसाइड समूह को पृथक कर स्टीविऑल उत्पादित किया जाता है | इसके अलावा गिबरेला फ्यूजीकरोई नामक फफूंद से गिवरैलिक एसिड के उत्पादन में भी इसका उपयोग होता है |  

उत्पत्ति स्थान एवं वितरण

स्टीविया (स्टीविया रिवौडिआना) मूलतः दक्षिण पश्चिम पैरागवे का है और इसका विस्तार संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्राजील, जापान, कोरिया ताइवान, एवं दक्षिण पश्चिम एशिया तक है | जापान एवं कोरिया में सामान्यत: इसे का—हे—ए (मीठी झाड़ी) के नाम से जाना जाता है |

स्टीविया की खेती में वनस्पति शास्त्र

स्टीविया रिवौडिआना (यूपेटोरियम रिवौडिआना)एस्टरासिएइ का सदस्य है | इसका पौधा पतला झाड़ीनुमा होता है और इसमें डंठन नहीं होते हैं | इसके पुष्प छोटे और सफेद तथा अनियमित क्रम में होते है |

स्टीविया की खेती  में जलवायु

यह एक मध्यम आर्द्रता का सबट्रॉपिकल पौधा होता है जो 11-41 डिग्री सेल्शियस तापमान पर उगाया जाता है | इसकी अच्छी वृद्धि के लिए 31 डिग्री सेल्शियस तापमान उपयुक्त पाई गई है | उचित एवं उष्ण दशाओं में इसका अंकुरण अच्छा होता है | इस प्रकार लांग ग्रोइंग सीजन, न्यूनतम पाला, उच्च प्रकाश और उष्ण ताप की अवस्था स्टीविया के पत्तों के उच्च उत्पादन में सहायक होती है |

स्टीविया की खेती में मिट्टी

पानी की विफलता के साथ दलदली रेतीली भूमि इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त होती है इसकी अच्छी बढ़त के लिए 6.5-6.7 पी.एच. की अम्लीय से उदासीन भूमि उपयुक्त होती है | इसकी कृषि के लिए क्षारीय भूमि का उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह पौधा लवण की उपस्थिति यह सहन नहीं कर पाता है |

स्टीविया की खेती में फसलोत्पादन

इस पौधे की खेती के लिए यद्पी बीजों के अंकुरण और तनों के रोपण, दोनों तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन चूँकि बीजों का अंकुरण बहुत कम होता है इसलिए सामान्यत: रोपण की विधि अधिक उपयुक्त कही जा सकती है |

रोपण के लिए पत्तों के अक्ष से 15 से.मी. लम्बाई का तना काटना होता है | इस कार्य के लिए चालू वर्ष के पौधों से बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं | पैकोब्यूट्राजोल के साथ 100 पीपीएम की दर से उपचारित करने पर जड़ों के शीघ्र ही जमने में सहायता मिलती है | इस उपचारण का अधिक प्रभाव उस समय देखने को मिलता है जब कटिंग्स का रोपण फरवरी-मार्च में किया जाता है |

स्टीविया की खेती में प्रजातियाँ

अभी तक इस फसल की किसी अन्य नाम से प्रजाति उपलब्ध नहीं है | इसे स्टीविया नाम से ही जाना जाता है |

स्टीविया की खेती कैसे करे

रोपण का तरीका

स्टीविया को सामान्यत: मेड़ो में रोपा जाता है जिसमें कतार की दूरी 22 से.मी. की मध्य होती है | पौधों को अच्छी तरह जमने के लिए कटिंग्स के रोपण के तत्काल बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए |

पोषक तत्वों का प्रबंधन

रोपण के पश्चात् खेतो को कार्बनिक खाद जैसे एफ.वाई,एम. अच्छी मात्रा में देना चाहिए | अच्छी तरह जुताई भी करनी चाहिए | अच्छी वृद्धि और ज्यादा पत्तों की प्राप्ति के लिए उर्वरक की खुराक 60:30:45 किलोग्राम एन.पी.के. प्रति हेक्टेयर देनी चाहिए | सूक्ष्म तत्वों जैसे बोरान और मैग्नीज के छिड़काव से भी पत्ते के उत्पाद में बढ़त देखी गई है |

स्टीविया की खेती में सिंचाई प्रबंधन

इसकी खेती के लिए पानी की अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है और ग्रीष्म ऋतू में नियमित सिंचाई जरुरी होती है | ग्रीष्म ऋतू में फसल की हर 8 दिन के अंतराल में सिंचाई करनी होती है |

स्टीविया की खेती के लिए फसलों की सुरक्षा

यह फसल पर्याप्त रूप से रुक्ष होती है | इस कारण इसमें विभिन्न प्रकार के कीटों और बीमारियों का आग्रमण नहीं हो पाता है | लेकिन कभी-कभी इसमें बोरान की कमी का प्रभाव देखने को मिलता है, जिससे पत्तों में धब्बे आ जाते हैं | दो प्रतिशत की दर से बोरेक्स का छिड़काव देकर इस समस्या से निजात पाई जा सकती है |

स्टीविया की खेती में पुष्पों छंटाई

स्टेवियोसाइड चूँकि पत्तों में होता है इसलिए पौधों की अच्छी बढ़त और प्रकाश संश्लेषकों के अधिक संग्रहण को सुविधा प्रदान करने के उद्देश्य से इसके पुष्पों की छंटाई की जाती है | पुष्पों की छंटाई पौधों के रोपण के 30, 45, 60, 75 एवं 85 दिनों के पश्चात की जाती है | रैटून फसल होने की स्थिति में सामान्यत: पहली कटाई के 40 दिनों के पश्चात् पुष्प आते हैं अत: ऐसी स्थिति में छंटाई 40 और 55 वें दिन की जाती है |

स्टीविया की खेती में कटाई एवं उपज

इसकी फसल रोपण के तीन माह पश्चातपहली कटाई की अवस्था में आ जाती है | पुनरोत्पादन को सहूलियत प्रदान करने के लिए पौधों को जमीन से 5-8 से.मी. ऊँचाई पर काटना चाहिए | नब्बे दिन के अंतराल पर इसे पुन: काटा जा सकता है | एक वर्ष में इसकी चार बार कटाई की जा सकती है | उत्पदान प्रति हेक्टेयर प्रति फसल लगभग 3 से 3.5 टन पत्ते प्राप्त किये जा सकते हैं | इस प्रकार एक हेक्टेयर क्षेत्र से प्रति वर्ष लगभग 10 से 12 टन पत्ते प्राप्त किये जा सकते है |

काढ़े का निस्सारण

इस प्रक्रिया के अन्तर्गत कच्चे माल का जल निस्सारण किया जाता है | प्रकियाकरण के पूर्व पत्तों के 0.3-0.9 मिमी. के टुकड़े किये जाते हैं और उन्हें एसीटोन के साथ 58 डिग्री सेल्शियस ताप पर 5 घंटो तक शोधित किया जाता है |

इसके पश्चात् 25-90 डिग्री सेल्शियस ताप पर निर्वात के द्वारा मिश्रण से एसीटोन को पृथक कर दिया जाता है निस्सरण 40-50 डिग्री ताप तक 2 से 4 घंटो तक जारी रखा जाता है | इसके पश्चात् प्राप्त सामग्री को निथारकर और सारकृत कर कृत्रिम मिठास प्रदान करने वाला तत्व प्राप्त किया जाता है जिसका औषधि और अन्य कार्यो में उपयोग किया जाता है |  


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