राजमा की खेती

{प्रमुख जानकारी} राजमा की खेती से मुनाफा कमाए | rajma ki kheti

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राजमा की खेती का सामान्य परिचय rajma ki kheti

राजमा की खेती दलहनी फसलो में से एक महत्वपूर्ण फसल है, इसकी उत्पादन क्षमता चना एवं मटर की तुलना में अधिक है इसलिए विकास एवं निति को देखते हुए इसकी और ध्यान केन्द्रित करना आवश्यक है यह फसल महाराष्ट्र, हिमांचल, प्रदेश, उत्तरप्रदेश, जम्मू-कश्मीर एवं उत्तर पूर्वी राज्यों में 80-85 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में उगाई जाती है, जिसके फलस्वरूप अब यह रबी एवं ग्रीष्म में भू उत्तरी राज्यों में ली जा रही है | पारंपरिक रुप से राजमा की खेती खरीफ के मौसम में ली जाती है जबकि बेहतर प्रबंधन द्वारा रबी के मौसम में भी अधिक उपज ली जा सकती है |

राजमा की पोषक महत्वा

प्रोटीन22.9%
वसा1.3%
कार्बोहाइड्रेट60.6%
कैल्शियम260mg/100g
स्फुर410mg/100g
लोहा5.8mg/100g

राजमा की खेती के लिए राज्यवर प्रमुख प्रजाति का विवरण

राज्यप्रजातियाँ
उत्तरप्रदेशएच.यू.आर.-137, मालवीय राजमा-137
महाराष्ट्रवरुण(ए.सी.पी.आर-940940), एच.पी.आर.-35
बिहारआई.पी.आर.-96-4 (अंवर)
राजस्थानअंकुर
कर्नाटकअर्का अनुप
गुजरातगुजरात राजमा-1
उत्तराखंडवी.एल.राजमा-1.25, वी.एल.बिन-2

राजमा की खेती के लिए जलवायु

पहाड़ी क्षेत्रो में बुवाई खरीफ में एवं निचले स्थान तथा तराई क्षेत्र में बसंत ऋतू में की जाती है यह उत्तर पूर्वी क्षेत्रो एवं महाराष्ट्र के पहाड़ी क्षेत्रो में रबी में ली जाती है | यह फसल पाला एवं जल भराव के प्रति अधिक संवेदनशील है है | फसल की वृद्धि के लिए 10 से 27 डिग्री सेल्सियस अनुकूल तापमान है | 30 डिग्री से ज्यादा तापमान होने पर फूलों के झड़ने की अधिक समस्या पायी गयी है | 5 डिग्री तापमान से कम होने पर फूलों एवं फलियों तथा शाखाओं में क्षति होती है |

भूमि एवं भूमि की तैयारी

राजमा की खेती हल्की बलुई दोमट से भारी चिकनी मिट्टी में तथा जहाँ नही पर्याप्त हो, में की जाती है | दलहन फसलों की अपेक्षा राजमा की खेती के लिए प्रयोग आने वाली मिट्टी घुलनशील, लवणमुक्त, एवं उदासीन होनी चाहिए | अन्य दलहन फसलो की अपेक्षा राजमा एक मोटे आवरण वाली फसल है तथा इसकी बुवाई हेतु भूमि की तैयारी प्राथमिक जुताई द्वारा तैयार करे एक हैरो या देशी हल चलाने के बाद पाटा चलाना आवश्यक है, भूमि खरपतवार एवं पिछली के अवशेष से मुक्त होनी चाहिए | पहाड़ी क्षेत्रो की अम्लीय मृदा को बुवाई पूर्व चुने से उपचारित करना चाहिए |

राजमा की खेती के लिए बुवाई का समय

  • खरीफ पहाड़ी इलाको में – जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के पहले सप्ताह तक |
  • रबी समतल क्षेत्रो में – अक्टूबर के दुसरे पखवाड़े में बुवाई करनी चाहिए |
  • बसंत ऋतू निचली पहाडियों पर – मार्च के दुसरे पखवाड़े में बुवाई की जाती है |

बीज दर एवं बीज की दुरी

100-125 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर खरीफ (पहाड़ी) 45-50 8-10 सेमी. रबी एवं बसंत 40×10 सेमी.(सिंचित) 40×40 सेमी(बारानी)

राजमा की खेती के लिए फसल प्रणाली

पहाड़ी क्षेत्रो में यह अंतर्वार्तीय फसल प्रणाली के रूप में मक्के के साथ 1:2 के अनुपात में लिया जाता है, मक्के की दो पंक्तियाँ (90 सेमी- कतार से कतार की दुरी ) के बीच में राजमा की दो पंक्तियाँ (30 सेमी कतार से कतार की दुरी) के अंतर पर लगायें | दोनों फसलो को कुछ इस प्रकार समायोजित करे की राजमा 120000/ हेक्टेयर एवं मक्का 40000/हेक्टेयर की पौध संख्या प्राप्त हो |

समतल क्षेत्रो में इसे बसंत में आलू की खुदाई तथा सरसों की कटाई के पश्चात् लगायें इस फसल को अधिक नाइट्रोजन की आवश्यकता के कारण अगेती आलू के साथ 2:2 तथा 2:3 के अनुपात में अंतरवर्तीय फसल के रूप में ले |

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उर्वरक प्रबंधन

दूसरी दलहन फसलो की अपेक्षा राजमा में नाइट्रोजन स्थिरीकरण नही होता, जिस वजह से गांठ बनने की प्रक्रिया नही होती है जिसके कारण इसे अन्य फसलो की अपेक्षा नाइट्रोजन की आवश्यकता अधिक होती है | अच्छे उत्पादन हेतु सामान्यतः 90-120 किलोग्राम नाइट्रोजन आवश्यक है नाइट्रोजन की आधी मात्रा बुवाई के समय तथा शेष आधी मात्रा प्रथम सिंचाई के उपरांत छिड़काव के रूप में दे |

अनाज फसलो की भांति स्फुर का प्रभाव राजमा में अच्छा पाया गया, इसकी स्फुर आवश्यकता दूसरी दलहन फसलो की अपेक्षा अधिक है तथा लगभग 60-80 किलोग्राम/हेक्टेयर स्फुर देना उत्तम होता है |

राजमा की खेती किस मौसम में की जाती है

राजमा की खेती के लिए जल प्रबंधन

उथली जल एवं अधिक उर्वरक की मांग की वजह से सिंचाई की अधिक आवश्यकता होती है, 2-3 सिंचाई उत्तर पूर्वी मैदानी क्षेत्रो में तथा 3-4 सिंचाई मध्य मैदानी क्षेत्रो में की जाती है | फसल की क्रांतिक अवस्था अथवा बुवाई उपरांत प्रथम सिंचाई 25 दिन बाद एवं द्वितीय 75 दिन पश्चात् करें |

खरपतवार प्रबंधन

अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए फसल की प्रारंभिक अवस्था के 25-30 दिन तक खरपतवार से मुक्त रखना चाहिए | समेकित खरपतवार नियंत्रण के लिए पैंदीमिथालीन की 0.75-1.00 किलोग्राम सक्रीय तत्व को 400-600 लीटर पानी में घोल बनाकर बुवाई के बाद तथा अंकुरण से पूर्व छिड़काव करे इसके बाद एक निंदाई 30-35 दिन बाद करना लाभदायक रहता है |

राजमा की खेती में किट एवं रोग नियंत्रण

एन्थ्रेक्नोज –

 प्रभावित पौधे के बीज पत्र पर पीले भूरे चित्तेदार धब्बे दिखाई देते है, पत्तियों के उपरी, निचली एवं साथ ही साथ तनो पर भी गहरे रंग के धारीदार धब्बे दिखाई देते है |

नियंत्रण –

  • बीजोपचार थायरम + कार्बेडाजिम (2+1) 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज ग्राम की दर से उपचार करे
  • मेन्कोजेब का छिड़काव 0.25% (2.5ग्राम/लीटर) की दर से अथवा कार्बेडाजिम 0.1% (1 ग्राम/लीटर) का 2-3 बार पत्तो में छिड़काव बुवाई के 40, 60 व 75 दिन के बाद करें संक्रमित पौधे को खेत से बाहर निकाले तथा फसल अवशेष को नष्ट करे |
  • 2-3 साल का फसल चक्र अपनाये
  • फव्वारा पद्दति से सिंचाई ना करे
  • खेत में अधिक नमी होने पर आवाजाही ना करे

तना गलन –

लक्षण –

इसके प्रारंभिक लक्षण पत्तियों पर छोटे जलीय धब्बे के रूप में संक्रमण के 4 से 10 दिन में ही दिखाई देने लगते है, धब्बे का केंद्र सुखकर भूरा तथा किनारे चमकीले पीले रंग के हो जाते है |

नियंत्रण –

  • कार्बेडाजिम का 0.1% (1 ग्राम/लीटर) की दर से 2-3 बार पत्तियों पर छिड़काव फुल आने के समय एवं उसके पहले करे |
  • अच्छी जल निकासी वाली भूमि में बुवाई करे
  • घनी बुवाई न करे

कोणीय धब्बे –

लक्षण –

पत्तियों पर कोणीय लाल भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते है, धब्बे आपस में मिलकर नेक्रिसिस जैसी अवस्था बनाकर पत्तियों को गला देती है |

नियंत्रण –

  • बीजोपचार फफुन्द्नाशक दवा कार्बेडाजिम से 2-3 ग्राम/किलोग्राम बीज की दर से करे |
  • कार्बेन्डाजिम का छिड़काव (0.1%) संक्रमण की शुरुवात में तथा बुवाई के 5-6 सप्ताह बाद पर्ण छिड़काव के रूप में करे |
  • कटाई पश्चात् गहरी जुताई कर फसल अवशेष को नष्ट करे |

किट एवं रोग नियंत्रण

पर्ण सुरंगक –

लक्षण –

पत्तियां पिली होकर झड़ जाती है, अधिक संक्रमित पौधा बौना रह जाता है यह किट वनस्पतीय अवस्था म दिखाई देते है |

नियंत्रण –

  • मिथाइल डेमेटान 1ml/लीटर की दर से छिड़काव करे |
  • संक्रमित पौधों को निकालकर खेत से दूर फेंके |
  • संक्रमित पत्तियों को तोड़कर नष्ट करे |
  • नीम के पानी का छिड़काव भी पर्ण सुरंगक के लिए लाभप्रद है |

तना मक्खी –

लक्षण –

तानो का फुल जाना एवं दो हिस्सों में टूटना अथवा पार्श्व जड़ो का न बनना | संक्रमित पौधे में आकस्मिक जड़ो का न दिखाई देना, अंकुरित पौधे का सुख कर मर जाना |

नियंत्रण –

  • क्लोरोपायिरिफास 8ml/हेक्टेयर की दर से बीजोपचार करे |
  • फोरेट-10G 10 किलोग्राम मात्रा का बुवाई के समय उपयोग करे |
  • पलवार की मदद से मृदा में नमी बरक़रार रखना जिसमे आकस्मिक का तुरंत बनना एवं मेगट क्षति से बचाना |

काला माहू –

लक्षण –

यह किट पत्तियों के रस चुसता है, अधिक संक्रमित पौधों की पत्तियां सुख कर मुड़ जाती है, फलियाँ बौनी एवं विकृत हो जाती है पौधे सुख कर मर जाते है |

नियंत्रण –

  • जैविक नियंत्रण – काकसिनेला सेप्टमपन्कटा का विमोचन/1000 वयस्क प्रति 400 वर्ग मीटर के हिसाब से करे |
  • इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. की 0.5ml/ लीटर पानी की दर से छिड़काव करे |
  • सिस्टमेटिक कीटनाशक जैसे दायमेथोएट या मिथाइल डेमेटान 1 ml प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करे |

कटाई एवं गहाई

125-130 दिन में फसल पककर तैयार हो जाती है कटाई के बाद फसल को 3-4 दिन तक धुप में सुखाए जब तक बीज की नमी 9-10 प्रतिशत न हो जाए |

राजमा की खेती से उपज

20-25 क्विंटल/हेक्टेयर सिंचित खेती में समतल क्षेत्रो में तथा 5-10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बारानी खेतो में पहाड़ो पर 40-50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के भूसे की प्राप्त होती है |

राजमा की खेती से अधिकतम बुवाई लेने हेतु आवश्यक बिंदु

  • ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई तीन वर्ष में एक बार अवश्य करें |
  • बुवाई पूर्व बीजोपचार अवश्य करे |
  • पोषक तत्वों की मात्रा मृदा परिक्षण के आधार पर ही दे |
  • पौध संरक्षण के लिए एकीकृत पौध संरक्षण के उपायों को अपनाना चाहिए |
  • खरपतवार नियंत्रण अवश्य करे |
  • तकनिकी जानकारी हेतु अपने जिले/नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करे |
  • भारत सरकार एवं राज्य सरकार द्वारा फसल उत्पादन (जुताई, खाद, बीज, सूक्ष्म पोषक तत्व, कीटनाशी, सिंचाई के साधनों) कृषि यंत्रो, भण्डारण इत्यादि हेतु डी जाने वाली सुविधाओं/अनुदान सहायता/लाभ की जानकारी हेतु सम्बंधित राज्य/जिला/विकासखंड स्थित कृषि विभाग से संपर्क करे |

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