काजू की खेती

काजू की खेती की पद्धतियाँ | कैसे करे ?

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काजू की खेती का सामान्य परिचय

काजू एक प्रमुख बागवानी फसल है जिसे केरल, महाराष्ट्र, गोवा कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, और उड़ीसा में विस्तार रूप से काजू की खेती किया जा रहा है | पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, गुजरात तथा पूर्वोत्तर प्रदेशों में इसे कुछ हद तक काजू उगाया जाता है | लोकप्रिय नाश्ता में उपयोग के साथ-साथ काजू गारियों को आइसक्रीम, पेस्ट्री तथा मिठाइयों में शामिल किया जाता है, इसमें अधिक प्रोटीन और कम शक्कर होने के कारण आरोग्यवर्धक खद्यो में एक अंश के रूप में अधिक प्रमुखता पा रहा है |

भारत में वर्तमान में करीब 9.23 हेक्टेयर में 6.13 लाख टन का कच्छा काजू गुतलियो का उत्पादन हो रहा है, अभी पिछले वर्ष की तुलना में 8.93 लाख हेक्टेयर में 6.95 लाख टन कच्छा काजू गुतलियों का उत्पादन हुआ था देशीय और जनता की आवश्यकताओ को देखते हुए वर्तमान गरी का उत्पादन कम है |

भारत में 12 लाख टन काजू उत्पादन करने का सामर्थ्य है, मौजूदा बागानों का अधिक विस्तार बीजो से उगाया गया है जो पर्संचेसन प्रक्रिया के कारण पुष्पन, फलन, तथा अन्य गुणों में विजतियाँ दिखता है इस समस्या से निवारण के लिए वर्तमान में कायिक प्रवर्धन से पाया हुआ कलमो का रोपण के लिए शिफारिस किया जाता है |

काजू की खेती के लिए भूमि की तैयारी

काजू की खेती के लिए चुने हुए स्थल में जंगली पौधों तथा खरपतवार को हटाना चाहिए, कलम लगाने की जगह से 2 मीटर त्रिज्य में पौधों तथा खरपतवारो का जड़ो को निकल देना चाहिए | इससे न्य रोपित कलम को स्पर्धारहित स्थिति निश्चित किया जा सकता है |

गड्ढा खोदना

ढाल के आर पार में 7.5×7.5 मीटर या 8.0×8.0 मीटर की अंतर में 1x1x1 मीटर का गड्ढा खोदना चाहिए | “हेड्ज-रो” रोपण पद्धति में 1×5 मीटर अंतर रखने से खेती की आरंभिक वर्षो में अन्तराल फसल उगाने के लिए सुविधा होती है, रोपण से 15-20 दिन पहले गड्ढा खोदकर सूर्य की रौशनी में खुला रखना चाहिए ताकि दीमक जैसे जड़ को हानि पहुँचाने वाले कीड़ो को नष्ट कर सकता है, गड्ढे को उपरी मिटटी, 5 किलोग्राम कम्पोस्ट, 2 किलोग्राम कुरकुट खाद और 200 ग्राम रॉक फास्फेट का मिश्रण से तीन चौथाई तक भरना चाहिए पानी की अच्छी निकासी के लिए नाली निर्माण करना चाहिए |

काजू की खेती कैसे करे, kaju ki kheti
काजू की खेती

काजू की खेती के लिए कलम का रोपण

साधारणतः नर्सरियो में पांच महीने से ज्यादा उम्र का कलम मिलता है, आरोग्यपूर्ण कालमो को पोलीथिन थैली से सावधानी से निकलकर मिटटी के साथ ही रोपण करना चाहिए | कलम का रोपण के लिए गड्ढे के मध्य से थोड़ी सी मिटटी को निकलना चाहिए, गड्ढे में कलम रोपण के बाद धीरे से आस-पास के मिटटी को दबाना चाहिए, कलम की जोड़ को मिटटी से 5 सेमी. ऊपर रखना चाहिए, इससे प्रकंद से निकलने वाली प्ररोहो को हटाने में सुविधा होगी | गड्ढे को दो साल के अन्दर धीरे से भरना चाहिए |

खूंटा लगाना और धासपात डालना

कलम रोपण के बाद एक खूंटा लगाकर कलम को ढीला सा गांठ बंधना चाहिए ताकि अगर हवा तेज हो तो हानि न पहुंचे, नमी संरक्षण के लिए पौधों का आसपास से सुखा पत्तो और हर पत्तो से धास्पात करना चाहिए |

पौधों का देख-रेख, अनुवर्धन और छांटन

समय समय पर कलम जोड़ के निचे से आ रहे प्ररोहो को निकलना चाहिए, मुख्य तने के 75-100 सेमी. तक के निचली शाखाओ को सिकेचर से काटना चाहिए ताकि रोपण के चार पांच साल बाद मुख्य काण्ड ऊंचाई तक सीधा रहे | इसको हर साल क्रमशः करना चाहिए इससे कृषि कार्य, गुतलियो का संग्रहण तथा काजू काण्ड और जड़ छेदक हानि लक्षणों को पता लगाने में सुविधा होगी |

रोपण के दो साल तक पुष्पगुच्छो को निकालना चाहिए प्रथम फसल को तीसरा साल में ही लेना चाहिए | 4-5 साल के बाद सीधे बढ़ने वाला मुख्य कांड को 3.5 मीटर से 4.0 मीटर की ऊंचाई पर काटना चाहिए

काजू की किस्म

kaju ki kism
काजू की किस्म

काजू की बहुत सी उन्नत किस्मो का विकास राष्ट्रिय काजू अनुसन्धान केंद्र (पुत्तूर) द्वारा की गयी है उन्नत किस्मो की दृष्टि से भारत में लगभग 10-15 उन्नत किस्म के काजू का उत्पादन किया जा रहा है उनमे से कुछ निचे दिए गये है –

काजू की उन्नत किस्म-

  1. बी.पी.पी-2
  2. बी.पी.पी.-1
  3. उल्लाल-4
  4. उल्लाल-2
  5. वेगुरला-4
  6. टी-40

काजू की खेती में उर्वरक डालना मात्रा निर्धारण

रोपण के बाद (सालो में)   यूरिया  (ग्राम/पौधा) रॉक फास्फेट  (ग्राम/पौधा)म्यूरेट ऑफ़ पोटाश    (ग्राम/पौधा)
133012540
266025080
3990375120
41320500160
5 और अधिक1650625200
urwarak ki matra

काजू के खेत में उर्वरक डालना

दोमट मिटटी तथा कम बारिशवाली जगहों में (पूर्व तटीय तथा भीतरी प्रदेश) उर्वरको को 50 सेमी चौड़ाई की वर्तुलाकार पट्टियों में क्रमशः मुख्य कांड से 0.5 मीटर, 0.7 मीटर, 1.0 मीटर प्रथम, द्वितीयक, तृतीय, और चौथे साल में लगाना चाहिए |

अधिक बारिश वाली प्रदेशो में मखरली मिट्टी और ढालूआँ मिट्टीयों में 25 सेमी चौड़ाई तथा 1.5 सेमी. गहराई की वर्तुलाकार खंदको में उर्वरक को 0.5 मीटर, 07 मीटर, 1.0 मीटर, एवं 1.5 मीटर की दुरी में क्रमशः प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं चौथे वर्ष में डालना चाहिए उर्वरक को मिटटी में मिला देना चाहिए |

उर्वरको की उपयोग क्षमता बढ़ाने के लिए हरा पत्तो को बिछाकर मल्च करना चाहिए अधिक बारिश में और मिटटी में नमी की कमी होने पर उर्वरक नही डालना चाहिए अगस्त महीने के दुसरे हफ्ते में जब बारिश कम रहता है उस समय उर्वरक दे सकते है |

kaju ka ped
काजू का पेड़

मिटटी और जल संरक्षण विधियाँ

तीसरे साल से पहले ढालुवो प्रदेशों में प्रत्येक पौधा के चारो तरफ में एक जल संग्रहण खंदक बनाना चाहिए कगारों को 1.8 मीटर से 2 मीटर तक त्रिज्य में बनाना चाहिए और ढालके उपरी तरफ में एक जल संग्रहण खंदक बनाना चाहिए जो 2 मीटर लम्बाई और 0.3 मीटर चौड़ाई और 0.45 गहराई का रहना चाहिए | पौधे का आस पास की मिटटी पर जैविक पदार्थो को बिछाकर घासपात (मल्च) करने से बारिश के समय में भूक्षरण और धुप से मिट्टी की नमी का बचाव हो पाता है |

काजू की खेती के लिए सघन रोपण पद्धति

सघन रोपण पद्धति से काजू बागानों का शुरुवात चरण में खाली जमीन को पौध संख्या बढ़ाकर लाभदायक रूप से उपयोग कर सकेंगे | अधिक घनत्व रोपण पद्धति कम उर्वरता वाले प्रदेशो को अत्यंत शुक्त है क्योंकि ऐसे जगहों में पौधों का प्रवर्धन बहुत धीरे होता है जिससे आरंभिक वर्षो में अधिकांश भूभाग खुला रहता है | ऐसे जगहों में यदि साधारण घनत्व रोपण पद्धति में 8×8 मीटर का अंतर (156 पेड़/हेक्टेयर) रखने से आरंभिक चरणों में उपज बहुत कम रहता है |

625 पेड़/हेक्टेयर (4×4 मीटर का सघन रोपण पौध संख्या जानी रखने से कम उर्वरता मिट्टी में छटवी साल तक का काजू उपज को 4 गुना बढ़ा सकता है और 12 साल तक 2.5 गुना बढ़ा सकते है सघन रोपण के लिए 5×5 मीटर (400 पेड़/ हेक्टेयर) तथा 6×4 मीटर (415 पेड़/हेक्टेयर) का अन्य अंतर भी शिफारिस किया जाता है |

पौध संरक्षण

चाय मच्छर TEA MOSQUITO BUG [TMB] का प्रबंधन-

नरम प्ररोहो, पुष्प गुच्छो, अपक्व गुतलियो तथा फलों से शिशुकिटो और वयस्क किटो ने रस चूसता है, जिस वजह से काले धारिया पड़ता है | प्ररोहो तथा पुष्पगुच्छो पर इन धारियों ने मिलकर प्ररोह अंगमारी या पुष्पगुच्छ अंगमारी उत्पन्न करता है, इस किट का हानि गंभीर होने पर अभादित पेड़ो की रक्षण के लिए फुहार लेना आवश्यक है, लगातार कल्ला निकलने वाले पांच साल उम्र से कम अल्पवयस्क बागानों को कीटनाशक फुहारों से रक्षित करना चाहिए | उसके बाद बागानों में आवश्यकतानुसार फुहार लेना चाहिए

  • फुहार के लिए शिफारिश किये हुए कीटनाशक इस प्रकार है
  • अंकुरण या कल्ला निकलने की अवस्था में
  • मोनोक्रोटोफ़ांस (0.05%/यानि 1.5 ml/लीटर पानी में )
  • पुष्पं/फलन अवस्थाओं में : कार्बरिल (0.1% यानि 2ग्राम/लीटर पानी में
  • अथवा L- सैहलोथ्रिन(0.003 यानि 6ml/10 लीटर पानी में )

स्प्रेयर भरने से पहले कीटनाशक को अच्छी तरह मिश्रित करना चाहिए | दिन में 10:00 बजे तक और श्याम के 4:00 बजे के बाद ही फुहार देना चाहिए | हवा के विरुध्द फुहार नहीं करना चाहिए | कीटनाशक की खाली डिब्बों को नष्ट करके मिट्टी में गहराई में गाड़ना चाहिए | पीने वाली पानी की मूलों के आसपास की काजू पेड़ों को फुहार देते वक्त सुख्त ध्यान रखना चाहिए | फुहार करने वाले व्यक्ति अपने मुह और नाक को मास्क से बांधना चाहिए | प्लाटों में निराई के बाद ही फुहरी करना चाहिए |

kaju ki kheti kaise kare
kaju ki kheti kaise kare

काजू कांड और जड़ छेदक (Cashew Stem and Root Borer [CSRB]) का प्रबंधन

उपेक्षित काजू बागानों में स्थित या आसपास में स्थित पुराना काजू पेड़ों CSRB की हानि को ज्यादा उन्मुक्त होता है प्रोढ़ मादा भ्रिंगो में कांड के विदरिका में (मिटटी के स्तर से नजदीक ) या खुला हवा जड़ो में अन्डो को रखते है, अन्डो से निकलने वाली नवजात सुंडिया तुरंत कांड और जड़ों की छाल में सुरंग बनाते है | छाल में व्यापक सुरंग बनाने के पश्चात् पोषक अंश के बहाने में बाधा आता है जिससे पत्ते व टहनियां सुख जाते है |

बाधित जगह मे गोंद और फ्रांस पेड़ से रिसते है जो चिकित्सा के लिए प्रारंभिक लक्षण है, मुख्य कांड या जड़ की बाधित छाल जिसके निचे “फ्राँस” होता है, उसे सावधानी से छाल को ज्यादा हानि ना पहुंचाकर निकालना चाहिए | सुरंगों में ताजा “फ्राँस” के तरह छाल को CSRB सुंडियों को पता करके निकालकर नाश करना चाहिए |

पेड़ के नजदीक  सकेद “फ्राँस” पड़ना सुंडियाँ अन्तः कांड में कोश बनाने समय का चिन्ह है | इस अवस्था में कोश का सुरंग में एक मोड़ने वाले तार को सुरंग के अंदर घुसाकर बार-बार दबाना चाहिए जब तक कीचड़दार आवाज सुनाई देता है | सफ़ेद द्रव बाहर निकलेगा जो अन्दर बसे हुए सुंडिया कोश का हानि की सुचना है | उसके बाद चिप्पडाया हुआ भाग को क्लोरोपैरिफास (0.2%) (10 मी.ली. कीटनाशी /लीटर पानी में ) घोल से फाहना चाहिए |

जिन पेड़ की छाल की परिधि में 50% से ज्यादा हानि है या जिनके पुरे पत्ते पीले हुए है, वह पेड़ नहीं बच पायेगा, लेकिन उनमे रहने वाली कीट अवस्थाओं भविष्य में कीट आक्रमण के मूल हो सकते है |

इसलिए ऐसे पेड़ जो नहीं बच पायेगें, उन्हें पौधस्वच्छता के अंतर्गत जड़ से उखाड़कर उनमे बचे हुए कीटों को निकालकर, नाश करके तुरंत दूर हटाना चाहिए ताकि अगले साल के लिए कीट आक्रमण के मूल कारण न-बने | गुटली संग्रहन के समय (फरवरी से मई) कीट आपात शुरू होती है; उसी समय में कीट बाधित पेड़ों को सूक्त तरीके से निशाना लगाया जा सकता है | बाद में निशाना लगाये हुए पेड़ों को 25 से 30 दिन के भीतर “रोगहर कार्रवाई” करना चाहिए, ताकि सूडीयां और ज्यादा हानि न करे |

काजू की खेती में कटाई

सिर्फ गिरे हुए काजू का गुतलियों को ही पेड़ के निचे से संग्रहन करना चाहिए | फलों को पेड़ों से कभी भी नहीं तोड़ना चाहिए | गुतलियों को फल / सेब से अलग करके धूप में 2-3 दिन तक सुखा के बोरियो में जमीन से 4-6 इंच उपरी भाग में भण्डारित करना चाहिए |

गुटली पैदावार

सभी शिफरित किस्मों को 8 कि.ग्रा. / पेड़ या 1.0 से 1.5 टन / हेक्टेयर तक की संभाव्य पैदावर देने की क्षमता है | काजू तीसरी साल से उपज देती है, फिर भी प्रबंधन की स्तर के आधार से पूर्ण संभव्य उपज लगभग 8 कि.ग्रा. / पेड़ पाने के लिए 8 से 10 साल लगता है |  


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