हल्दी की खेती कैसे करे

हल्दी की खेती करके लाभ उठायें | कैसे करे ? पूरी जानकारी |

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हल्दी की खेती – परिचय

हल्दी की खेती में भारतवासी की सम्यक आहार व्यवस्था में हल्दी का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है, हल्दी का प्रयोग परिवार में परम्परागत से लेकर आधुनिक रहन सहन की पृष्ठभूमि में भी यथावत | कश्मीर से कन्याकुमारी, मान्जुली से कच्छ के रन तक सभी प्रकार के भारतवासियों एवं वर्ग विशेष में हल्दी आध्यात्मिक, व्यावसायिक, औद्योगिक एवं गृह उपयोग के महत्व के कारण लोकप्रिय है |

विभिन्न प्रकार के गुणों से भरपूर उपयोगिता के आकर्षण के सापेक्ष देश में निरंतर हल्दी की मांग वृद्धि क्रम में बनी रहती है हल्दी का सामान्य उपयोग डाल, सब्जी, मांस-मछली, आचार मक्खन, पनीर, केक एवं जेली में सुगंध, रंग औषधीय एवं पोषकिय दृष्टी से किया जाता है | हल्दी का कृमिनाशक गुण एवं पीलापन इसमें उपस्थित करक्यूमिन तत्व के कारण होता है

हमारे देश में हल्दी की खेती दक्षिण में आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, केरल पश्चिम में महाराष्ट्र, पूर्व में उड़ीसा, बिहार एवं उत्तर प्रदेश में की जाती है | पूर्वी उत्तरप्रदेश के वाराणसी, फ़ैजाबाद, इलाहाबाद, जौनपुर, मिर्जापुर, गाजीपुर, देवरिया, गोरखपुर, सिद्धार्थनगर, महराजगंज, बस्ती, बाराबंकी एवं गोंडा जनपदों में हल्दी की खेती बहुतायत से की जाती है |

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हल्दी की खेती में जलवायु

हल्दी की खेती के लिए गर्म व नर्म जलवायु सर्वोत्तम होती है, औसत 750-1200 mm वर्षा उपयुक्त होती है | बोवाई तथा जमाव के समय कम वर्षा व पौधों के वृद्धि एवं विकास के समय अधिक वर्षा का अनुकूल प्रभाव पड़ता है | फसल परिपक्वता अवधि में पूर्ण शुष्क वातावरण की आवश्यकता होती है | हल्दी की फसल में जलवायु का अधिक प्रभाव पड़ता है |

हल्दी की खेती  के लिए भूमि

हल्दी के लिए जीवांश युक्त दोमट या बलुई दोमट मिटटी जिसमे जल निकास का उचित प्रबंध हो प्रति इकाई क्षेत्र कम लागत में अधिकतम उत्पादन के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है | हल्दी की खेती में भूमि का होना प्रथम आवश्यकता है |

खेती की तैयारी

हल्दी की फसल के लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के उपरांत 2-3 जुताइयाँ कल्टीवेटर से या देशी हल से करके पाटा लगाकर मिटटी को भुरभुरी कर लेना चाहिए, जीवांश कार्बन का स्तर बनाये रखने के लिए अंतिम जुताई के समय 25-30 टन भलीभांति सड़ी हुई गोबर की खाद/कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिला देना चाहिए | जीवांश कार्बन युक्त एवं भुरभुरी मिटटी में गांठो की संख्या एवं आकार दोनों में वृद्धि होती है |

बीज उपचार

हल्दी के बुवाई के पूर्व कंद को फफुन्द्नाशक इंडोफिल एम-45 की 2.5 ग्राम अथवा कार्बेन्डाजिम 1 ग्रांम प्रति लीटर पानी की दर से पानी में घोल बनाकर उपचारित करना चाहिए, घोल में कंदों को 60 मिनट तक डुबोकर रखने के उपरांत छाया में सुखाकर 24 घंटे बाद ही बुवाई करनी चाहिए |

हल्दी की खेती में बोवाई का समय

हल्दी की बुवाई का उचित समय 15 अप्रैल से 30 जून तक होता है, पूर्वी उत्तर प्रदेश में कम एवं मध्यम अवधि वाली किस्मो के लिए 15 मई से 15 जून और लम्बी अवधी वाली किस्मो के लिए 15-30 जून तक का समय सर्वोत्तम है |

हल्दी की खेती करने के लिए विधि

हल्दी की बोवाई क्यारियों में समतल भूमि पर अथवा मेड़ों पर या दोनों तरीकों से की जा सकती है, समतल क्यारिओं में पंक्ति से पंक्ति की दुरी 30 सेमी. तथा कंद से कंद की दुरी 20-25 सेमी. रखते है | प्रत्येक को 4-5 सेमी की गहराई पर बोना चाहिए, बोने के बाद सामान्य दशा में लगभग 30 दिन पर कंद अंकुरित होती है | सिंचित भूमि में अंकुरण 15-20 दिन में हो जाता है |

हल्दी की खेती में बीज दर

प्रति इकाई क्षेत्र आवश्यक बीज की माता कंदों के आकार पर निर्भर करता है, मुख्य रूप से स्वस्थ एवं रोगमुक्त माता कंद एवं प्राथमिक प्रकंदो को ही बीज के रूप में प्रयोग करना चाहिए, बोवाई के समय प्रत्येक प्रकंदो में 2-3 सुविकसित आँख अवश्य होनी चाहिए सामान्यतः कंद के आकार व वजन के अनुसार 15-20 क्विंटल कंद प्रति हेक्टेयर की दर से आवश्यकता होती है |

उन्नतशील प्रजातियों का चुनाव

हल्दी की कई उन्नतशील प्रजातियाँ विकसित की गयी है इनमे से कुछ अच्छी प्रजातियाँ दक्षिणी भारत में प्रचलित है, उत्तरी एवं पूर्वी भारत में राजेंद्र, सोनिया, एन.डी.एच.-14, एन.डी.एच.-18, बरुआसागर, पड़रौना लोकल आदि किस्मे अच्छी उपज देती है | परिपक्वता अवधि एवं रसायनों की आधार पर अनेक किस्म बाजार में उपलब्ध है |

 प्रजाति फसल अवधीताजे कंदों का औसत उत्पादन (टन/हेक्टेयर)करक्यूमिन (प्रतिशत)ओलियोरेजिन (प्रतिशत)शुष्क उपलब्धता/पदार्थ (प्रतिशत)क्षेत्रों के लिए संस्तुत
राजेंद्र सोनिया22527.08.410.018पूर्वी UP, बिहार
सुगंधा21015.03.1011.023.3गुजरात, UP, किट व्याधियो के लिए सहिष्ण
स्वर्णा20017.58.7013.520केरल, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश
एन.डी.एच.-1820035-37.58.011.522.0उत्तरप्रदेश एवं उत्तरांचल
एन.डी.एच.-14205-21030-32.57.013.821.5उत्तरप्रदेश एवं उत्तरांचल

हल्दी की खेती के लिए खाद एवं उर्वरक

खाद एवं उर्वरक की मात्रा खेत की मिटटी की जाँच करवाकर दी जानी चाहिए, हल्दी की फसल अन्य फसलो की अपेक्षा भूमि से अधिक पोषक तत्वों को ग्रहण करती है | अच्छी उपज में जीवांश कार्बन की महत्व को देखते हुए 250-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर गोबर या कम्पोस्ट की सड़ी हुई खाद अंतिम जुताई के समय मिला देना चाहिए |

रासायनिक खाद के रूप में प्रति हेक्टेयर 120-150 किलोग्राम नाइट्रोजन 80 किलोग्राम फास्फोरस 80 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है | नाइट्रोजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा पंक्ति के दोनों तरफ बीज से 5 सेमी की दुरी तथा 10 सेमी गहराई में डालना चाहिए |

नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा दो बार में खड़ी फसल में प्रथम बार बुवाई से 35-45 दिन एवं द्वितीय बार 75-90 दिन पर पंक्ति के बीच बुरकाव के रूप में डालना चाहिए नाइट्रोजन उर्वरक के बुरकाव के समय ध्यान रखें की खेत में पर्याप्त नमी हो |

सिंचाई एवं जल निकास

हल्दी की फसल को पर्याप्त सिंचाई की आवश्यकता होती है मिटटी की किस्म, जलवायु, भूमि की संरचना, वर्षा एवं पलवार के अनुसार 10-20 दिन के अन्तराल पर सिंचाई की जाती है प्रकंदो के जमाव व वृद्धि विकास के समय भूमि को नम रखना आवश्यक है |

उचित जल निकास फसल के लिए आवश्यक है इसके लिए खेत की ढाल की दिशा में 50 सेमी चौड़ी तथा 60 सेमी गहरी खाई बना देनी चाहिए जिससे अवांछित जल खेत के बाहर निकल जाये, वर्षा के समय खेत से जल निकास अत्यंत आवाश्यक है |

हल्दी की खेती में खरपतवार नियंत्रण

हल्दी के खेत में पत्तियों की पलवार (मल्चिंग) लगाने से काफी हद तक खरपतवार नियंत्रण हो जाता है हल्दी की फसलों में 2-3 बार गुड़ाई करने से खरपतवार नियंत्रण के साथ-साथ कंदों में वृद्धि और विकास हेतु सुविधाजनक परिस्थितियां उपलब्ध होती है |

किट व्याधि नियंत्रण

फसल पर प्रायः किट व रोग का प्रकोप कम होता है, कभी कभी फफूंद जनित पर्णचित्ती रोग एवं कंद सड़न लग जाता है | इसकी रोकथाम के लिए व्लाइटास्क 0.3% का घोल या डाईथेन एम-45 के 0.25% के घोल का छिड़काव 10-15 दिन के अन्दर पर तीन बार करना चाहिए |

हल्दी की फसल में दीमक एवं थ्रिप्स किट का आक्रमण होता है, जिसके नियंत्रण के लिए 1 लीटर डाईमेथोएट 30 ई.सी. को 800-1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए |  हल्दी को किटो के प्रकोप से बचाने हेतु नीम की पत्ती का भी प्रयोग किया जा सकता है |

खुदाई एवं भण्डारण

हल्दी की खुदाई, बुवाई के 6-9 महीने बाद जब पौधों की पत्तियां पिली पड़कर सूखने लगे तब फसल खुदाई हेतु तैयार समझना चाहिए | कंदों के खुदाई के समय भूमि में हल्की नमी होना लाभप्रद रहता है इससे पुरे कंदों को अच्छी तरह से निकाला जा सकता है |

हल्दी की खेती कैसे करे

कंदों से ऊपर की पत्तियों को काटकर अलग कर लेते है, इनमे से बीजों के लिए कंदों की छटाई करके भण्डारण कर लेते है | कंदों को पानी से अच्छी तरह से साफ़ कर लेने के पश्चात् प्राथमिक व द्वितीयक कंदों को अलग अलग कर लेते है, और विधि पूर्वक उबालने के उपरांत सुखाकर हल्दी के रूप में बेच देना चाहिए |

हल्दी का संसाधन

हल्दी के संसाधन के लिए हल्दी के कंदों को साफ़ कर तुड़ाई के उपरांत माता कंद एवं आकारनुसार छांट कर अलग कर लेते है इसको आकार के अनुसार उबालने के दौरान एक समय में और एक तरह की हल्दी तैयार होती है, उबालने के लिए दो आयताकार लोहे के पैन या कढ़ाव की आवश्यकता होती है |

एक बड़े कढ़ाव में 100 लीटर जल डाल कर एक अन्य छेद युक्त हैंडल लगा आयताकार लोहे का कढ़ाव में 50 किलो हल्दी रखकर उबाला जाना चाहिये उबालते समय बड़े कढ़ाव में हल्दी पानी में पूरी तरह डूबी रहनी चाहिए हल्दी उबालने के दौरान कढ़ाव के पानी में किसी भी प्रकार के रसायन डालने की आवश्यकता नही है |

यदि अम्लीय जल है तब खाने का सोडा या सोडियम बाईकार्बोनेट(100 ग्राम) का प्रयोग किया जाता है हल्दी के कंदों को तब तक उबाला जाता है जब तक हल्दी में आया उबाल कम न हो जाये और हल्दी की खुशबू आनी लगे पूरी तरह उबलने पर हल्दी के टुकडो में सलाई डालने पर आर पार हो जाती है |

इस उबालने की प्रक्रिया में करीब 30-40 मिनट का समय लगता है, हैंडल से कढ़ाव को उठाकर पानी को निथार लेते है और इसे 4-5 घंटे के लिए ठंडा होने के लिए छोर दिया जाता है कढ़ाव में अवशेष पानी को फिर हल्दी उबालने के लिए प्रयोग किया जाता है हल्दी को अधिक उबालने से उसकी गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है |

हल्दी को उबालने के पश्चात् सुखाने के लिए किसी चटाई या फर्श पर डालकर 10-12 दिन सुखाते है, समय समय पर इसे पलटा जाता है अंत में हल्दी के गांठे की नमी 10-12% पहुँच जाती है |

हल्दी की खेती में पालिशिंग

बाजार में हल्दी की अच्छी कीमत लेने के लिए हल्दी की पालिशिंग किया जाना जरुरी है, जिससे हल्दी आकर्षक व चमकदार हो जाती है पालिशिंग के लिए पिला रंग या हल्दी पाउडर को हल्की नमी के साथ किसी ड्रम में हाथ से मिलाकर सुखा देते है उसके बाद इसको किसी वायुरोधी बड़े डिब्बों में इसका भण्डारण कर सकते है |

हल्दी की सफल खेती और रोग निदान के लिए निम्न तरीको पर ध्यान देना बहुत ही आवश्यक है:-

  1. ग्रीष्म ऋतू में खेत की जुताई एवं मृदा सौरीकरण |
  2. स्वस्थ रोग मुक्त/अवरोधी उन्नतशील प्रजातियों की बोवाई को प्राथमिकता देनी चाहिए |
  3. फसल अवाषेशो व खरपतवार आदि को एकत्र करके नष्ट कर दे, गड्ढे में दबा दे या जला दे |
  4. पंक्तियों और पौधों के बीच वांछित दुरी अवश्य बनाये रखे, और फसल अवधी के दौरान अवांछित पौधों को निकाल दे |
  5. उचित समय पर संतुलित पोषक तत्वों/उर्वरको को क्रमबद्ध तरीके से देकर बोवाई अवश्य करें |
  6. खेत में पानी के निकास की समुचित व्यवस्था हो और समुचित जल प्रबंध अपनाये |
  7. एकीकृत नाशी जीव प्रबंध के सभी संसाधनों जैसे समय से उपयुक्त शश्य क्रियाएं, यांत्रिक क्रियाएं, जैविक अवस्थाओं, पदार्थो एवं रासायनिक विधिओं का समय पर उपयुक्त एवं समन्वित प्रयोग अवश्य करें |
  8. समय से खरपतवार नियंत्रण अवश्य करें |
  9. यदि हानिकारक किटो की समस्या आती है तब समय-समय पर निदान के उपाय अवश्य अपनाये |
  10. जैविक खाद, कम्पोस्ट या उर्वरको का भूमि में संस्तुति अनुसार संतुलित प्रयोग करें |
  11. रसायनों का प्रयोग जैसे भुरकाव, छिड़काव, आदि अंतिम स्थिति मे अस्त्र के रूप में अपरिहार्य स्थिति में ही अपनाएं और बीमारी के लक्षण दिखने पर ही आवश्यकता होने पर 10-15 दिन के अन्तराल पर ही अपनाएं |
  12. प्रकंदी की खुदाई, फसल पकने के उपरांत कंदों की पूर्णतया तैयार हो जाने पर ही करें, अन्यथा संसाधन के समय प्रसंस्कृत हल्दी पर सिकुडन आने की सम्भावनाये रहती है, कंदों में उचित नमी के समय ही खुदाई करें |

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