फूलगोभी

गोभी की खेती करके अपनी आमदनी बढ़ाए | कैसे करे इसकी जानकारी hindi

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गोभी की खेती का सामान्य परिचय

फूलगोभी शीतकालीन सब्जियों में प्रमुख स्थान है, गोभी की खेती गठे हुए श्वेत पुश्पुन्ज के लिए की जाती है इसका उपयोग सब्जी के अलावा आचार, सलाद, पकोड़े एवं सूप बनाने में किया जाता है | फूलगोभी प्रोटीन ,कैल्शियम एवं विटामिन सी की भी अच्छी स्त्रोत है अनुसन्धान कार्यों के फलस्वरूप मध्य वर्तीय क्षेत्रों हेतु बेमौसमी फूल गोभी ( पछेती किस्म ) की उत्पादन तकनीक विकसित की गयी है, जिसके परिणाम स्वरुप काफी बड़े आकार की फूलगोभी (औसतन 800-1000 ग्राम) के सफ़ेद फुल उत्पादित किये जा सकते है |

इसे बड़े शहरो में अधिक मूल्य में बेच कर अधिक शुद्ध लाभ अर्जित किया जा सकता है, उत्तराखंड मे अभी तक ful gobhi के अगेती किस्मो की खेती बेमौसमी फसल के रूप मे की जाती है, परन्तु इसके फुल काफी छोटे होने के कारण पैदावार कम होने से किसानो को शुद्ध आर्थिक लाभ कम मिलता है | परन्तु संसथान द्वारा विकसित तकनीक को अपनाकर फूल गोभी का उत्पादन बढ़ाने के साथ साथ किसानो को अच्छा लाभ मिलता है |

फूलगोभी की खेती के लिए जलवायु

फूलगोभी को मूलतः शीतल एवं आर्द्र जलवायु का फसल माना जाता है, अच्छे अंकुरण के लिए फूलगोभी को 15-20 सेंटीग्रेट तापमान की आवश्यकता होती है | फुल गोभी के फुल का बनना बहुत हद तक तापमान पर निर्भर करता है, अनुकूल तापमान नही मिलने पर नर्सरी में फुल आ जाते है अथवा केवल वानस्पतिक वृद्धि ही होती है | पछेती किस्म को आवश्यकता से अधिक तापमान में उगाने से केवल वानस्पतिक बढ़वार ही होती है |

फुल gobhi की उन्नत किस्मे

पूसा स्नोबॉल – 1

  1. यह प्रजाति भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान के क्षेत्रीय सब्जी प्रजनन केंद्र, कटराइन (हिमांचल प्रदेश) द्वारा विकसित की गयी है
  2. यह शीतग्रस्त क्षेत्रों में या शरद ऋतू में लगाने के लिए उपयुक्त है
  3. इसकी पत्तियां सीधी खड़ी रहती है
  4. इसकी फुल बर्फ के सामान श्वेत वर्ण, ठोस व आकर्षक होते है |

पूसा स्नोबॉल k-1

  1. यह प्रजाति भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान के क्षेत्रीय सब्जी प्रजनन केंद्र, कटराइन (हिमांचल प्रदेश) द्वारा विकसित की गयी है
  2. इसकी बाहरी पत्तियां फैलावदार होती है |
  3. यह श्यामगलन रोग की प्रतिरोधी है |
  4. फुल गोभी के स्नोबॉल की यह सबसे पछेती किस्म है |
  5. इसकी औसत उपज 20-25 टन प्रति हेक्टेयर है |

बीज बुवाई का समय

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गोभी की खेती

पछेती बेमौसमी ful gobhi का बीज पौधशाला में बोने का उपयुक्त समय नवम्बर, दिसंबर (पॉलीहाउस) से मध्य जनवरी तक है |

पौध तैयार करना

सर्दियों के समय पर्वतीय क्षेत्रो में तापमान कम होने के कारण पौध तैयार होने में अधिक समय लगता है. अतः नर्सरी को पॉलीहाउस या पॉलीटनल के अन्दर लगाने पर अंकुरण अच्छा होता है तथा पौध भी जल्दी तैयार हो जाती है |

पौधशाला के चयन के लिए रोगमुक्त भूमि का चुनाव करना चाहिए, जहाँ सिंचाई की उचित व्यवस्था तथा पर्याप्त मात्रा में धुप उपलब्ध हो |

फूलगोभी की खेती के लिए खेत की तैयारी

फूलगोभी के लिए लगभग सभी प्रकार की भूमि उपयुक्त है, भूमि में उर्वरता तथा नमी प्रचुर मात्रा में होनी चाहिए | फुल गोभी की अच्छी फसल हेतु मिटटी की उचित PH मान 6.0 से 6.5 होता है | पछेती किस्मो के लिए भारी दोमट मिटटी उपयुक्त है, जिसमे पानी के निकास की उचित व्यवस्था हो | क्यारी की मिटटी को जोतकर एवं पाटा लगाकर भलीभांति भुरभुरी और समतल कर लेना चाहिए, जिसमे पर्याप्त नमी अधिक से अधिक समय तक ठहर सके |

गोभी की खेती के लिए बीज दर

अच्छी उपज के लिए उत्तम बीज का प्रयोग अनिवार्य है, फुल गोभी की अगेती व पछेती किस्मो की बीज दर अलग अलग है क्योंकि अंकुरण सामान्यतः एक जैसा नही होता पछेती किस्मो की बीज दर 400-500 ग्राम प्रति हेक्टेयर है |

फूलगोभी की खेती के लिए पौधरोपण एवं दुरी

जहाँ तक संभव हो रोपण सांयकाल में करें तथा उसके बाद हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए, मध्य पर्वतीय क्षेत्रो में में इसकी रोपाई मध्य जनवरी से लेकर मध्य फ़रवरी तक की जा सकती है, पछेती किस्मो में अधिक बढ़वार के कारण दुरी अधिक रखनी चाहिए, अतः इन किस्मो में 50 से 50 सेमी. की दुरी उचित रहती है | फुल बनते समय खेत में उचित नमी होना अनिवार्य है |

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गोभी का उपरी भाग

सिंचाई

सिंचाई की मात्रा भूमि के प्रकार, वर्षा तथा मौसम पर निर्भर करती है, पछेती किस्मो में 10-15 दिन के अन्तराल में सिंचाई की जनि चाहिए |

गोभी की खेती के लिए खरपतवार नियंत्रण

खरपतवार फुल गोभी की फसल को बहुत हानि पहुंचाते है, फुल गोभी में गहरी गुड़ाई नही करनी चाहिए क्योंकि इनकी जड़े जमीन में 10-15 सेमी से गहरी नही जाती है | रोपण के 20-25 दिन बाद जड़ो में मिटटी चढ़ा देनी चाहिए, खरपतवार का रासायनिक नियंत्रण आर्थिक दृष्टी से किसानो के लिए लाभकारी होता है | पौध रोपण से पहले 1.20 किलोग्राम फ्लुक्लोरालिन या 25 किलोग्राम अलाक्लोर अथवा 2 किलोग्राम बासालिन प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग लाभप्रद होता है |

कुपोषण विकार

बोरोन कुपोषण

बोरोन की कमी से गोभी का फुल पूर्ण रूप से विकसित नही हो पाता है, प्रारंभ में गोभी पर छोटे छोटे भूरे धब्बे दिखाई देते है तथा बाद में फुल हल्का गुलाबी या भूरे रंग का हो जाता है, फुल बनने से पहले इसकी कमी का पता नही चलता है | उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में PH अम्लीय होने के कारण भूमि में बोरोन की मात्रा काफी कम होती है इसकी कमी को पूरा करने के लिए 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बोरेक्स या बोरोन खाद अथवा उर्वरको के साथ डालना चाहिए |

मोलिब्डीनम कुपोषण

मोलिब्डीनम की कमी से गोभी की पत्तियां पिली पड़ जाती है जो बाद में मुरझा कर गिर जाती है तथा आने वाले पत्तियां भी विकृत हो जाती है, फसल को जब नाइट्रोजन की मात्रा अधिक दी जाती है तो मोलिब्डीनम की उपलब्धता कम हो जाती है | विभिन्न उर्वरको की निश्चित मात्रा के साथ 1 से 1.50 किलोग्राम मोलिब्डीनम प्रति हेक्टेयर फसल में देने से गोभी की उपज में वृद्धि होती है |

गोभी की खेती में रोग नियंत्रण

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1. आर्द्र पतन

पौध जमीन की सतह से गलकर मरने लगती है इसके उपचार और रोकथाम के लिए निम्न उपाय अपनाने चाहिए –

  1. भूमि में कल निकास की उचित व्यवस्था करनी चाहिए |
  2. नर्सरी का स्थान ऊँची जगह पर चुने एवं हर वर्ष बदलती रहे |
  3. कार्बेन्डाजिम एक ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार कर बुवाई करें अथवा जैविक विधि से बीज उपचार हेतु ट्राईकोडर्मा विरिडी (4 ग्राम/किलोग्राम बीज) अथवा ट्राईकोडर्मा हरजीयानम 10 ग्राम/किलोग्राम बीज अथवा 25 ग्राम ट्राईकोडर्मा एवं 2.5 किलोग्राम गोबर की खाद में मिलाकर प्रति नाली की दर से पौधशाला की मिटटी में मिलाये |
  4. नर्सरी में बीज की घनी बुवाई न करें और बुवाई कतारों में करें |
  5. पौधशाला को सौर्यकरण द्वारा निर्जिविकरण करें |
  6. बुवाई के 10 दिन बाद कार्बेन्डाजिम की 1 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर क्यारियों को तर करे तथा पुनः 15-20 दिन बाद ईसी दवा की घोल से क्यारी को तर कर ले |

2. जड़ विगलन

इस रोग के कारण रोपाई के उपरांत कुछ पौधों की बढ़वार रुकी हुई होती है पौधों को उखाड़कर देखने के बाद पता चलता है की इनकी जड़े गलकर केवल एक तार की तरह हो गयी है इसकी रोकथाम के लिए बीज उपचार आर्द्र पतन रोग जैसा करें, रोपाई के समय पौध को दवा के घोल में डुबोकर लगायें तथा रोग के लक्षण खेत में दिखाई देने पर कार्बेन्डाजिम का 0.1% की दर से (1ग्राम/लीटर) पानी से घोल बनाकर पौधों की जड़ो के पास छिड़काव करें तथा उचित फसलचक्र भी अपनाये |

3. काला सड़न रोग

नये पौधों से उनके बीज बनने तक किसी भी समय रोग के लक्षण उत्पन्न हो सकते है, पत्तियों की शिराएँ काले या भूरे रंग की तथा पत्तियों में वी (V) के धब्बे दिखाई पड़ते है | गोभी का उपरी हिस्सा काला और मुलायम होकर सड़ने लगता है |

उपचार

  1. बीज को बोते समय स्त्रेप्तोसाइक्लेन 0.01% यानि (100ml/किलोग्राम बीज) दवा के घोल में उपचारित कर लेना चाहिए |
  2. खड़ी फसल में स्त्रेप्तोसाइक्लेन एक ग्राम प्रति 10 लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए, पहला छिड़काव पौध लगाने के तुरंत बाद, दूसरा छिड़काव गोभी में फुल (कर्ड) बनते समय और तीसरा छिड़काव फलिया बनते समय करें |

4. मृदु विगलन

लक्षण :- इस रोग का संक्रमण खरोंच लगे स्थानों में होता है इसका सम्बन्ध काले सड़न रोग भी है जो इस रोग को फ़ैलाने में सहायक होता है गोभी का उपरी भाग मुलायम होकर सड़ने लगता है, सड़न की गति नमी की मात्रा पर निर्भर करती है |

उपचार :-

  1. खड़ी फसल में ब्लीचिंग पाउडर 12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से सिंचाई के पानी में मिलाकर देने से रोग का प्रकोप कम हो जाता है, 10-15 दिन के अन्तराल पर फिर से दवा का प्रयोग करना चाहिए, यह काला सड़न रोग के नियंत्रण हेतु भी प्रभावी है |
  2. फसल में वेविस्टिन/बेनोमिल का छिड़काव भी रोग नियंत्रण में सहायक होता है |

गोभी की खेती में किट नियंत्रण

1. हरिक पीठ किट

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gobhi ka ful

इस किट की सुंडीयां अन्डो से निकलकर पत्तियों को खाती हुई सुरंग बनती है तथा साथ साथ अपना मल मूत्र उसमे छोडती जाती है फलस्वरूप गोभी खाने योग्य नही रह जाती |

पहचान :

इस किट का वयस्क हल्के भूरे रंग की तितली होती है, बैठने पर इसके पीठ पर तीन हीरे की तरह चमकीले चिन्ह दिखाई पड़ते है इसके वयस्क की लम्बाई लगभग 8 mm होती है इस किट की सुंडियो का रंग हल्का पीलापन लिए हुए रहता है |

नियंत्रण :

  • प्रत्येक 25 गोभी की पंक्तियों के दोनों तरफ सरसों की दो पंक्तियों की बुवाई करनी चाहिए जिससे इस किट का प्रौढ़ आकर्षित होकर सरसों पर अंडा दे, इसका रासायनिक नियंत्रण आसानी से किया जा सकता है, सरसों की पहली पंक्ति की बुवाई गोभी के 15 दिन पहले एवं दुरी पंक्ति की बुवाई गोभी के 25 दिन बाद करनी चाहिए |
  • जैविक नियंत्रण हेतु परजीवी डाईडेग्मा सेमिक्लासम उपयुक्त पाया गया है, इसके अतिरिक्त वैसिलस युरिन्जीएन्सिस जीवाणुओं का छिड़काव 1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से कारगर पाया गया है |
  • रासायनिक नियंत्रण के लिए मैलाथियान 0.05 प्रतिशत या इन्डोसल्फान 0.07 प्रतिशत या क्विनालफास 0.05 प्रतिशत का छिड़काव करें |

2. अर्द्धकुंडलन किट –

पहचान :

इस किट का वयस्क छोटी तितली होती है, इसकी सुंडीयां अर्द्ध कुंडल आकार में चलती है, ये पत्तियों के हरे भाग को खाकर नष्ट कर देती है फलतः शिराएँ ही नजर आती है | अधिक प्रकोप होने पर फसल पूर्णतः नष्ट हो जाती है |

नियंत्रण :

  • समूह में सुंडीयां जब पौधों पर एकत्रित रहती है तब पौधों को उखाड़कर नष्ट किया जा सकता है |
  • रासायनिक नियंत्रण करने के लिए मैलाथियान 50 ई.सी. अथवा कार्बेरिल 50 W.P. दवा का 1 ml प्रति लीटर की दर से छिड़काव लाभदायक है |
  • नीम के बीज का 5 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करे तथा फेरोमोन प्रपंच का प्रयोग करें |

3. गोभी की तितली

यह एक सफ़ेद रंग की तितली है, जिसके पीले रंग के अंडे गुच्छों में पत्तियों की पिछली सतह पर बहुतायत में दिखाई पड़ते है, अन्डो से निकलने वाली शुरुवाती अवस्था से ही यह पत्तियों को भारी क्षति पहुँचती है

इसके नियंत्रण हेतु सबसे पहले अन्डो को चुनकर नष्ट कर दे, साथ ही इन्डोसल्फान 35 ई.सी. का 2ml अथवा इंडाक्साकार्ब 4.5 ई.सी. का 0.2ml., बैसिलस युरिन्जीएन्सिस का 1.5-2.0 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें |

गोभी की खेती में फसल की कटाई

जब गोभी का फुल पूर्ण आकृति व रंग ग्रहण कर ले, तो इसकी कटाई करनी चाहिए, देर से कटाई करने पर फुल का रंग पिला पड़ने लगता है जिससे इसका बाजार भाव घट जाता है इसके फुल को उखाड़ने की अपेक्षा तेज चाकू से जमीन की सतह से थोडा ऊपर से काट लेना थोडा अच्छा होता है |

गोभी की खेती में उपज

बेमौसमी पछेती फूलगोभी की औसत उपज 150 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त की जा सकती है |

गोभी ई खेती का

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