गाजर की खेती

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गाजर की खेती का सामान्य परिचय

मैदानी भागो में गाजर की खेती रबी अर्थात् सर्दियों के मौसम में जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में बर्फ पिघलने के पश्चात् बसंत या ग्रीष्म ऋतू में की जाती है | पश्चिमि राजस्थान के शुष्क भागों, खासकर जोधपुर व इसके आसपास के सिंचित क्षेत्रों में इसकी खेती बहुत लाभकारी है और इस वजह से इसकी व्यापक स्तर पर खेती की जा रही है |

गाजर सर्दियों में उगाई जाने वाली सब्जी की एक प्रमुख फसल है, हमारे आहार में इसका उपयोग विभिन्न रूपों में पाया जाता है, इसकी ताज़ी जड़ो का उपयोग सलाद, ताज़ा रस, हलवा तथा सब्जी बनाने के अलावा प्रसंस्कृत उताप्दो जैसे आचार, मुरब्बा, जैम, सूप, कैंडी आदि में किया जाता है | इसकी जड़ो का संतरी लाल रंग इसमें उपस्थित बीटा कैरोटिन की उपस्थिति के वजह से होता है जो एक उत्तम एंटी ऑक्सीडेंट है तथा गाजर इसका सर्वोत्तम स्त्रोत माना जाता है |

हमारे शरीर में बीटा कैरोटिन यकृत द्वारा विटामिन ‘ए’ में परिवर्तित कर दिया जाता है, विटामिन ‘c’ थायमिन, राइबोफ्लेविन, नायसिन, भोज्य रेशा, लोहा, फास्फोरस तथा शर्करा गाजर में पाये जाने वाले अन्य प्रमुख पोषक तत्व है | गाजर औषधीय गुणों का भंडार है यह आखों की अच्छी दृष्टि तथा शारीर की प्रतिरोधक क्षमता बनाये रखने तथा आंतो को साफ रखने में सहायक है |

गाजर का पोषक महत्व (प्रति 100 ग्राम)

जल86 ग्राम
प्रोटीन0.9 ग्राम
कार्बोहाइड्रेट10.6 ग्राम
वसा0.2 ग्राम
भोज्य रेशा1.2 ग्राम
कैल्शियम80 मिलीग्राम
फास्फोरस30 मिलीग्राम
पोटैशियम108 मिलीग्राम
सोडियम35.6 मिलीग्राम
लौह तत्व2.2 मिलीग्राम
विटामिन ‘ए’3150 आई.यू.
थायमिन0.04 मिलीग्राम
विटामिन ‘सी’3.0 मिलीग्राम
नायसिन0.6 मिलीग्राम
ऊर्जा48.0 किलो कैलोरी
राइबोफ्लेविन0.02 मिलीग्राम
गाजर में पोषक तत्व
gajar का photo
gajar की kheti
गाजर की फोटो

इस क्षेत्र की रेतीली भूमि इसके जड़ो के अच्छे विकास के साथ साथ उत्तम आकार के लिए उत्तरदायी है, तथा जड़ विकास के समय ठंडा व शुष्क वातावरण इसकी मिठास तथा बेहतर रंग के लिए अत्यंत उपयोगी माना जाता है |

इस क्षेत्र में पैदा होने वाली गाजर अपेक्षाकृत अधिक लम्बी व सीधी होती है, ये सभी करक स्थानीय तथा दूरस्थ बाजारों में यहाँ की गाजर के अच्छे मूल्य के सहायक है | यहाँ उत्पादित गाजर स्थानीय बाजारों में हि नही बल्कि अहमदाबाद, जयपुर, मुम्बई, बैंगलोर आदि प्रमुख शहरो में अपनी खास पहचान बनाकर अधिक मूल्य अर्जित कर किसानो को लाभ पहुंचा रही है |

पोषक तत्वों से भरपूर पौधों के उपरी हिस्से जिसमे प्रोटीन, खनिज लवण तथा विटामिन्स अच्छी मात्रा में पाये जाते है जिसका उपयोग पशुओ के लिए हरे चारे के रूप में किया जाता है इस प्रकार इसके उत्पादन के साथ साथ हरा चारा भी मिल जाता है |

इस क्षेत्र में मुख्यतः एशियाई गाजर की खेती की जाती है, जो युरिपियो गाजर की अपेक्षा अधिक तापमान सहन कर सकती है एवं इससे उत्पादन भी अधिक प्राप्त होता है | गाजर की बुवाई यहाँ कई बार की जाती है जिससे बाजार में इनकी उपलब्धता अक्टूबर-नवम्बर से शुरू होकर लगभग फरवरी-मार्च तक लगातार बनी रहती है |

कम लागत में अधिक लाभ देने के साथ-साथ अल्प सफल में तैयार होनी वाली फसल होने के कारण रबी के मौसम में अन्य फसलों की अपेक्षा gajar ki kheti यहाँ के सिंचित क्षेत्रों के किसानों की पहली पसंद बनती जा रही है | अच्छी तरह से खेती कर इस फसल की निर्यात में काफी सम्भावनाएं हैं | इस क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण गाजर की अधिक उत्पादन हेतु इसकी उन्नत उत्पादन तकनीकें अपनाकर किसान भाई इसकी खेती को और लाभकारी बना सकते है |

गाजर की खेती में कंद
गाजर का कंद

गाजर की खेती के लिए किस्म का चुनाव

लम्बी अवधि तक बाजार में गाजर की उपलब्धता बनाएं रखने के लिए अधिक तापमान सहन करने में सक्षम एशियाई गाजर की उन्नतशील किस्मों का चयन महत्वपूर्ण है | पूसा केशर, पूसा मेघली, पूसा रुधिरा, स्लैक्सन 21, स्लैक्सन 233, सुपर रेड, आदि गाजर की प्रमुख उन्नतशील किस्में हैं |

गाजर की खेती में बीज एवं बुवाई

बुवाई हेतु उन्नतशील किस्मों का चुनाव के आलावा बीजों का स्वस्थ होना भी अत्यंत आवश्यक है | बीज की मात्रा बुवाई के समय, भूमि के प्रकार, बीज की गुणवत्ता, आदि पर निर्भर करती है, जो प्रति हेक्टेयर 5 से 8 कि.ग्रा. तक हो सकती है | अगेती फसल की बुआई हेतु अपेक्षकृत अधिक बीज की आवश्यक पड़ती है |

हल्की क्षारीय भूमि में तथा बुवाई पश्चात पपड़ी बनने की दशा में सघन बुवाई करने से बीज की मात्रा बढ़ जाती है | गाजर की बुवाई अगस्त से लेकर नवम्बर तक की जा सकती है, परन्तु अक्टूबर में बोई जानी वाली फसल उत्पादन तथा गुणवत्ता दोनों दृष्टी से सर्वोतम मानी जाती है |

भारी मिट्टी में बोवाई मेड़ों पर जबकि रेतीली में समतल क्यारियों में करना चाहिए | बुवाई क्यारियों 1-2 से.मी. गहराई पर 30-40 से.मी. की दुरी पर बनी पत्तियों में करनी चाहिए | बीजों को बारीक़ छनी हुई रेत में मिलाकर बुवाई करने से बीजों का वितरण समान होता है तथा बीज भी कम लगता है |

 बीज को 12-24 घंटे तक पानी में भिगाने के पश्चात छाया में सुखाकर बुवाई करने से आसानी से व जल्दी उगते हैं | बुवाई से पूर्व बीजों को राख के साथ रगड़ना भी जमाव के लिए अच्छा माना गया है

 बीज उगने के सप्ताह 2-3 सप्ताह के भीतर पत्येक पंक्ति में लगभग 6-8 से.मी. की दूरी छोड़कर फालतू पौधों को निकाल देना चाहिए,इससे पौधों की पढ़वार के लिए पर्याप्त स्थान मिलता है तथा जड़ों का विकास भी अच्छा होता है |

गाजर की खेती के लिए शस्य कियाएँ

गाजर की खेती में बीज बुवाई
गाजर की फसल

गाजर एक ठण्डी जलवायु की फसल है | इसके बीजम का जमाव 7 से लेकर 24०C तक आसानी से हो जाता है | अच्छे जड़ विकास एवं रंग हेतु 16-21०C तापक्रम उत्तम पाया गया है | इसकी खेती विभिन्न प्रकार की मिट्टी मे की जा सकती है, परन्तु उचित जल निकास वाली जीवांश युक्त रेतीली अथवा रेतीली दोमट मिट्टी इसकी सफल खेती के लिए उत्तम होती है | भरी मिट्टी में इसकी जड़ों का आकार व रंग अच्छा नहीं बन पाता | 6.5-7 पी.एच. मान वाली भूमि इसकी खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है, परन्तु इसे लगभग 8 पी.एच. मान तक सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है |

गाजर की अच्छी फसल के लिए भूमि को अच्छी तरह से तैयार करना अत्यंत आवश्यक है | भूमि की लगभग 1 फुट की गहराई तक अच्छी तरह से जुताई करनी चाहिए, जिसके लिए एक बार डिस्क हल से गहरी जुताई तथा तीन-चार बार हैरो चला कर पाटा लगा देना चाहिए ताकि मिट्टी एकदम भुरभुरी हो जाये |

गाजर की अच्छी पैदावार हेतु बुवाई से लगभग 2-3 सप्ताह पूर्व 20-25 / टन है. पूर्णतया सड़ी हुई गोबर  की खाद को खेत में भली भांति मिला देनी चाहिए | उर्वरको को अंतिम जुताई के समय भूमि में मिलाकर आवश्यकतानुसार मेड़ें तथा क्यारियां बना लेना चाहिए | उर्वरकों का प्रयोग मिट्टी की जाँच की आधार पर करनी चाहिए | सामान्य भूमि की दशा में 100 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फास्फोरस तथा 60 कि.ग्रा. पोटास प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए |

नाइट्रोजन की आधी तथा फास्फोरस एवं पोटास की पूरी-पूरी मात्रा अंतिम जुताई के समय तथा नाइट्रोजन की शेष बची आधी मात्रा बुवाई के लगभग एक माह पश्चात निराई-गुड़ाई के समय देना चाहिए | नाइट्रोजन को अधिक मात्रा में तथा देरी से देने से बचना चाहिए तथा इसकी वजह से गाजर पर सफ़ेद सुक्ष्म रोग तो अधिक बनते ही हैं साथ ही साथ गाजर का भण्डारण क्षमता पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है, जिससे दूरस्त बाजारों में भेजी जाने वाली गाजर का परिवहन के दौरान जल्द ख़राब हो जाने से इनका बाजार मूल्य कम हो मिलता है |

गाजर के बीज का जमाव धीरे तथा कुछ देरी से होता है, जिसके लिए बुवाई के पश्चात शीघ्र एक हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए | भूमि में पर्याप्त नमी बनाये रखने के लिए आवश्यकतानुसार 5-7 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए | कम सिंचाई की दशा में जड़े सख्त हो जाती हैं और इनमे कसैलापन भी आ सकता है, जबकि आवश्कता से अधिक सिंचाई करने से गाजर की जड़ों में मिठास की कमी हो जाती है |

फसल को बुवाई से लगभग 4-6 सप्ताह तक खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिए | इसके लिए बुवाई के तीसरे तथा पांचवे सप्ताह में खरपतवार निकलने के साथ-साथ खुरपी भी लगा देनी चाहिए | यदि फसल मेड़ पर बोई गई हो तो गुड़ाई के साथ-साथ मेड़ों पर मिट्टी भी चढ़ा देनी चाहिए | खरपतवार नाशी रसायनों जैसे पेण्डीमेथेलिन अथवा नाइट्रोफोन की 1 कि.ग्रा. / है. की दर से बुवाई के पश्चात व 2 दिन के भीतर छिड़काव करने से खरपतवारों से निजात मिल जाता है

गाजर की सफल खेती के लिए खुदाई एवं सफाई

गाजर की उपज
गाजर का उत्पादन

गाजर की खेती में बुवाई के 95 से लेकर 110 दिन भीतर खुदाई के लिए तैयार हो जाती है, परन्तु यह प्रायः इसकी किस्म, बुवाई के समय, भूमि के प्रकार,आदि पर निर्भर करती है | जड़ों के तैयार हो जाने पर एक हल्की सिंचाई देकर अगले दिन खुदाई करनी चाहिए | खुदाई हमेशा ठंडे मौसम में अर्थात् सुबह के समय अच्छा रहता है |

खुदाई के पश्चात् जड़ो पर लगी मिट्टी हटाने के लिए इन्हें पानी से साफ़ करते है, गाजर की जड़ो की सफाई हेतु एक विशेष पाकर की मशीन का प्रयोग किया जाता है | जिससे इन पर लगी मिटटी के सफाई के साथ साथ जड़ो पर लगे सूक्ष्म रोम तथा उपरी लगी सफ़ेद झिल्ली भी साफ़ हो जाती है, जिससे गाजर साफ़ और आकर्षक दिखने लगते है और बाजार भाव भी अच्छा मिलता है |

यह मशीन हाथ से अथवा ट्रेक्टर, विद्युत् मोटर या डीजल इंजन द्वारा पुल्ली व शाफ़्ट के जरिये चलाई जाती है तथा आधे घंटे के अन्दर गाजर की अच्छी तरह से सफाई कर देती है, हस्त चलित मशीन एक बार में 10-15 किलोग्राम गाजर की सफाई करती है, जबकि ट्रेक्टर, विद्युत् मोटर या डीजल इंजन द्वारा चलित मशीन इसकी कार्यक्षमता के अनुसार एक से लेकर पांच क्विंटल प्रति लोड तक सफाई कर सकती है |

गाजर की खेती से उपज

गाजर की पैदावार एवं गुणवत्ता किस्म, बुवाई के समय, भूमि के प्रकार, आदि पर निर्भर करती है, इसकी अगेती फसल (अगस्त बुवाई) से औसतन लगभग 20-25, मध्यम फसल (सितम्बर-अक्टूबर बोवाई) से 30-40 तथा देर वाली फसल (नवम्बर बुवाई) से 28-32 टन प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त होता है

गाजर की फसल सुरक्षा कैसे किया जाये ?

गाजर की खेती से प्राप्त गाजर
गाजर की खेती

आमतौर पर गाजर की फसल में किट व बीमारियों का प्रकोप शुष्क क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम होता है | कभी कभी देर वाली फसल में फफूंद जानित सफ़ेद चूर्णिल आसिता नामक बीमारी का प्रकोप होता है, इस बीमारी के लगने से पत्तों एवं डंठल पर सफ़ेद धब्बे नजर आने लगते है जो आगे चलकर बादामी रंग हो जाते है | इसकी रोकथाम के लिए 0.1% बेनलेट अथवा बाविस्टीन के घोल का छिड़काव 8-10 दिन  के अन्तराल पर करना चाहिए |

गाजर का भण्डारण

सामान्य दशा में गाजर को 3-4 से अधिक दिन तक भण्डारित नही किया जा सकता है परन्तु छिद्रित पालीथिन में रखकर इसे कम से कम लगभग 2 सप्ताह तक भण्डारित किया जा सकता है जबकि छिद्रित पोलीथिन में पैक हुई गाजर शीतगृह में 1-2 डिग्री सेल्सियस तापक्रम व 90-95 प्रतिशत आद्रता पर लम्बे समय (2-3) माह तक आसानी से संरक्षित की जा सकती है |

बीज उत्पादक तकनीक

इसके लिए गाजर के बीज की बुवाई अगस्त-सितम्बर माह में करते है तथा अन्य शश्य क्रियाएं व्यावसायिक गाजर की उत्पादन की तरह ही करते है, नवम्बर-दिसंबर माह में डंठल सहित इसकी जड़ो की खुदाई करते है तथा खुदाई के तुरंत बाद जड़ व डंठल दोनों के 2-3 इंच भाग को छोड़कर अन्य हिस्सों को काटकर अलग कर देते है, तत्पश्चात इन्हें पूर्णतया तैयार खेत में 30-30 सेमी के अन्तराल पर 60 सेमी. दुरी की पंक्तियों में रोपाई करते है |

रोपाई के पूर्व रोग व फटने की समस्या से ग्रसित, शाखायुक्त तथा ऐसे पौधे जिनमे असमय फुल दिखाई देने लगते है उसको काट-छाँट करके अलग कर देना चाहिए, जड़ो के रोपाई के तुरंत बाद एक हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए तथा किस्म की पहचान, प्रमाणीकरण, आदि की जानकारी पूर्व में ही सुनिश्चित कर लेनी चाहिए |

खेत को हमेशा खरपतवारों, कीटों तथा बिमारिओं से मुक्त रखना चाहिए, गाजर के बीज मई माह के अंत तक तैयार हो जाते है, पुष्पक्रम की कटाई सही अवस्था पर कर लेनी चाहिये अन्यथा देरी होने पर बीज झड़ने लगते है मड़ाई के पूर्व तथा कटाई के तुरंत बाद पुश्प्क्रमो को 1-2 सप्ताह तक सुखा लेना चाहिए अच्छी फसल के औसतन लगभग 1000-2000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज आसानी से प्राप्त किये जा सकते है |          

गाजर की खेती का विडियो

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