ड्रिप सिंचाई प्रणाली

{विशेष जानकारी} ड्रिप सिंचाई प्रणाली प्रति एकड़ , कैसे करें? पूरी जानकारी

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प्रस्तावना

भारतीय कृषि में पारम्परिक सिंचाई विधियों में मुख्य रूप से बोर्डर विधि, बेसिन विधि, कूड विधि आदि का प्रयोग सदियों से किया जा रहा है | जिसमे फसल की आवश्यकता से अधिक मात्रा में पानी के पटाव से वर्तमान में मृदा की पोषक तत्वों में कमी हो जाना, भूगर्भीय जल की सतह का काफी नीचे चला जाना, मिट्टी की उपजाऊ शक्ति का क्षीण हो जाना आदि त्रुटियों का उत्पन्न होना एक उदाहरण हैं |

सामान्यतया पारम्परिक विधि में फसल को उसकी आवश्यकता से कहीं ज्यादा पानी दिया जाता है जिसके परिणामस्वरूप मिट्टी का रेतीली हो जाना, भूमिगत जल स्तर का नीचे हो जाना, मृदा की उपजाऊ शक्ति में कमी होना आदि वर्तमान में साफ़-साफ दिखाई पड़ने लगा है | देश के कुछ हिस्सों में भूमिगत जल स्तर इतना निचे हो गया है कि पानी के लिए पानी नहीं मिल पाता है |

Drip इरीगेशन, ड्रिप सिंचाई प्रणाली योजना

इसी तरह से कृषि योग्य भू-भाग का एक बड़ा हिस्सा बेकार हो गया है, जिस पर खेती नहीं की जा सकती है | वर्तमान में इन उत्पादन त्रुटियों पर ध्यान धीरे-धीरे अब हमारे कृषकों को जानने लगे हैं | साथ ही साथ सरकार द्वारा भी इन त्रुटियों को दूर करने हेतु भिन्न-भिन्न प्रकार की परियोजनाएं बनाना शुरू कर दी है |

उदाहरण के तौर पर इस वर्ष (2005) भारत सरकार ने जल प्रबंधन हेतु ड्रिप सिंचाई योजना पर काफी अनुदान देने की घोषणा की है | हमारे देश के कुछ राज्यों जैसे – महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, राजस्थान, हरियाणा (कुछ भाग) आदि में टपकाव सिंचाई का प्रयोग कर कृषकगण काफी लाभान्वित हो रहे हैं |

उत्तरी बिहार का एक बड़ा क्षेत्र फल बागवानी की फसलों के लिए उपयोग किया जाता है, जिसमे लीची, आम, पपीता, केला आदि मुख्य है | वर्तमान परिपेक्ष में कृषकों को इन फसलों से उतना आमदनी नहीं मिल पाता है जितना मिलना चाहिए, जिसका अन्य कारणों की तुलना में वैज्ञानिक ढंग से सही समय पर सिंचाई न देना एक मुख्य कारण है |

टपकाव सिंचाई एवं इसके अवयव

टपकाव सिंचाई एक बहुबारम्बर्तीय सिंचाई की विधि है, जिसमे कम अन्तराल पर (गर्मियों में 1 दिन तथा ठंडक में 1 सप्ताह) आवश्यक पानी की मात्रा को पौधे के जड़ क्षेत्र में बूँद-बूँद के रूप में दिया जाता है | जो बाद में पौधा द्वारा उपयोग कर लिया जाता है | इस विधि से सिंचाई करने पर मृदा में नमी की कमी नहीं हो पाती है, जिससे पौधे का विकास समुचित रूप से होता है और फसल का उत्पादन काफी अच्छा होता है |

ड्रिप सिंचाई प्रणाली में फ़िल्टर (सैण्ड एवं स्कीन फ़िल्टर), पाईप लाइन (मुख्य, उप मुख्य एवं लेटरल) तथा ड्रिपर मुख्य अवयव होते हैं | इस प्रणाली में उर्वरक देने का भी प्रावधान होता है | फ़िल्टर, पानी में उपस्थित बाहरी अशुद्धियों जैसे खरपतवार, मिट्टी के कर्ण आदि को छानने का कार्य करता है |

मुख्य एवं उप मुख्य बाहरी अशुद्धियों जैसे खरपतवार, मिट्टी के कर्ण आदि को छानने का कार्य करता है | मुख्य एवं उपमुख्य पाईप लाइन प्लास्टिक पाईप के होते हैं, जो भूमि के नीचे लगभग 40-\45 से.मी. की गहराई पर स्थापित किये जाते है | लेटरल पाईप लाईन भूमि के ऊपर पौधों के तने के पास से होता हुआ मुख्य / उपमुख्य  पाईप लाईन से जुड़ा होता है | ड्रिपर पौधे के पास लेटरल पर लगाया जाता है |

ड्रिप सिंचाई प्रणाली में सर्वप्रथम पम्प द्वारा पानी फ़िल्टर में जाता है, जहाँ पानी में उपस्थित अशुद्धियाँ छान दी जाती है, और साफ़ पानी मुख्य / उपमुख्य पाईप लाईन से होता हुआ, लेटरल एक उचित सान्द्रता का उर्वरक घोल तैयार किया जाता है, जिसे किसी बड़े बर्तन में रख कर बेन्चुरी द्वारा पौधों को दिया जाता है | उर्वरक देने की इस विधि को फर्टीगेशन कहते है |

ड्रिप सिंचाई प्रणाली का प्रयोग

इस विधि का प्रयोग उन समस्त फसलों में सम्भव है, जो एक निश्चित अंतराल पर लगाये जाते है | फिर भी बागवानी एवं सब्जियों की फसलों में इसका प्रयोग सफलतापूर्वक किया जाता है | फलों में मुख्य रूप से आम, लीची, अमरुद, पपीता, केला, नींबू तथा सब्जियों में परवल, फूलगोभी, पत्तागोभी, बैगन, टमाटर, भिण्डी आदि में काफी उपयोगी होता है | वर्तमान में इस विधि का प्रयोग गन्ने की खेती के लिए भी काफी उपयोगी पाया गया है |

ड्रिप सिंचाई प्रणाली से लाभ

पारम्परिक सिंचाई की अपेक्षा टपकाव विधि के निम्न लाभ होते हैं :-

  1. 50 से 70 प्रतिशत जल की बचत की जा सकती है |
  2. 30 से 40 प्रतिशत खाद की बचत की जा सकती है |
  3. 35 से 50 प्रतिशत खरपतवार स्वत: कम हो जाता है |
  4. 35 से 45 प्रतिशत मजदूरों की बचत की जा सकती है |
  5. 25 से 30 प्रतिशत अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है |
  6. टपकाव सिंचाई प्रणाली में घुलनशील उर्वरक, पोषक तत्व तथा कीड़े मकोड़े मारने की दवा देनी की भी व्यवस्था होती है | जिसके द्वारा लगत खर्च में कमी की जा सकती है |
  7. इस विधि से असमतल भूमि को सफलतापूर्वक सिंचित बनाया जा सकता है |
  8. ऐसे भू-भाग जहाँ वर्षा जल पर ही खेती आश्रित है, वहाँ इस विधि का प्रयोग सफलतापूर्वक किया जा सकता है |
  9. जहाँ पर भूमिगत जल स्तर काफी नीचे है और नलकूप आदि लगाना सम्भव नहीं है, उन स्थानों पर यदि तालाब आदि में पानी उपलब्ध है, जो टपकाव सिंचाई विधि का प्रयोग कर सब्जियों आदि की खेती सम्पन्न की जा सकती है |

ड्रिप सिंचाई प्रणाली लागत एवं स्थापना

टपकाव सिंचाई प्रणाली में मुख्य एवं उपमुख्य पाईप लाईन भूमि के अंदर स्थापित किया जाता है, जबकि लेटरल पाईप जमीन पर पौधे के तने के पास से होते हुए स्थापित किया जाता है | ड्रिपर लेटरल पाईप पर पौधे के तने के पास लगाया जाता है | मुख्य / उपमुख्य पाईप लाईन स्थापित करने हेतु 40-50 से.मी. गहरी नाली बनाई जाती है, जिसमें निश्चित माप की पाईप (मुख्य / उपमुख्य) को बिछा दिया जाता है |

तत्पश्चात नाली में बिछाए गए पाईप से लेटरल पाईपों को पौधों की पंक्ति की अन्तराल पर जोड़ दिया जाता है | लेटरल पाईप के जुड़ने के उपरांत नाली को मिट्टी से ढंक कर समतल कर दिया जाता है | इसके बाद ड्रिपर को लेटरल पाईप पर पौधे के तने के पास लगा दिया जाता है |

बाद में लेटरल पाईप के अंतिम छोर को स्टापर द्वारा बंद कर दिया जाता है | अन्त में स्थापित पाईप लाइन को टपकाव प्रणाली के संयंत्र से जोड़ कर, पम्प द्वरा सिंचाई की प्रक्रिया संपन्न की जाती है | सामान्यत: टपकाव सिंचाई प्रणाली हेतु 7 एक.पी. का पम्प / ईंजन पर्याप्त होता है |

जहाँ तक प्रणाली के लागत खर्च की बात है, यह फसल के अन्तराल पर निर्भर करती है | उदाहरण तौर पर बागवानी की फसलों (फलों) में पेड़ एवं पंक्ति से पंक्ति के दूरी ज्यादा रखी जाती है, जिसके कारण काम मात्रा में लेटरल एवं ड्रिपर की आवश्यकता पड़ती है |

फलस्वरूप कुल लागत खर्च कम हो जाता है, जबकि सब्जियों की फसलों में पौधे से पौधे एवं पंक्ति से पंक्ति के बीच की दूरी कम रखी जाती है, जिसके कारण अधिक संख्या में लेटरल एवं ड्रिपर की आवश्यकता पड़ती है, परिणामस्वरूप लागत खर्च बढ़ जाता है | पंक्ति से पंक्ति एवं पौधे से पौधे के अंतराल के आधार पर टपकाव सिंचाई प्रणाली की स्थापना में लागत व्यव को तालिका-1 में दर्शाया गया है |

टपकाव सिंचाई प्रणाली का लागत खर्च

पंक्ति एवं पौध का अन्तराल लागत खर्च (रुपया)
12 मी X 12 मी20,500
10 मी X 10 मी22,500
08 मी X 08 मी25,500
06 मी X 06 मी36,500
05 मी X 05 मी38,500
04 मी X 04 मी47,500
03 मी X 03 मी44,000
03 मी X 1.5 मी50,000
2.5 मी X 2.5 मी49,000
2 मी X 2 मी54,000
1.5 मी X 1.5 मी73,000
1 मी X 1 मी63,000
1.8 मी X 1.5 मी61000
1.8 मी X 0.60 मी 75500
4.5 मी X 2.7 मी 43000
2.7 मी X 1.8 मी 51000

स्थापना खर्च

प्रणाली लागत खर्च का 5 प्रतिशत

टपकाव सिंचाई का प्रभाव

पारम्परिक सिंचाई की तुलना में टपकाव सिंचाई का प्रभाव फसल पर काफी सराहनीय होता है | प्रयोग के आधार पर विभिन्न फसलों में टपकाव सिंचाई की प्रभावों का उल्लेख नीचे किया गया है |

फसल उत्पादन

जैसे की तालिका -2 में दिखाया गया है, पारम्परिक सिंचाई की अपेक्षा टपकाव सिंचाई के प्रयोग से फसल की उपज में काफी वृद्धि होती है | उदाहरण तौर पर सब्जियों का फसल, जैसे बैगन में 62.64 प्रतिशत, फूलगोभी में 60.23 प्रतिशत, मिर्चा में 49.97 प्रतिशत, करेला में 54.39 प्रतिशत, ककड़ी में 45.16 प्रतिशत, आलू में 69.2 प्रतिशत एवं टमाटर में 43.53 प्रतिशत की वृद्धि पायी गई है | इसी प्रकार फलों, जैसे केला में 52.17 प्रतिशत. अंगूर में 23.11 प्रतिशत तथा पपीता में 76.92 प्रतिशत की उत्पादन की में वृद्धि पायी गई |

टपकाव सिंचाई की प्रयोग से फसल उत्पादन में वृद्धि का मुख्य कारण फसल को कम अन्तराल पर आवश्यक सिंचाई जल की आपूर्ति करना है | कम अन्तराल पर सिंचाई करने से मृदा में नमी की कमी नहीं हो पाती है, और फसल का समुचित विकास होता है, जिसका प्रभाव फसल उत्पादन पर काफी अच्छा पड़ता है |

सिंचाई जल की बचत

पारम्परिक विधि की तुलना में टपकाव सिंचाई विधि से काफी मात्रा में सिंचाई जल की बचत की जा सकती है | तालिका -2 में पारम्परिक सिंचाई की तुलना में टपकाव सिंचाई के प्रयोग से विभिन्न फसलों में सिंचाई जल की बचत को दिखाया गया है, जिसके अनुसार टपकाव सिंचाई द्वारा बैगन में 61.9 प्रतिशत, फूलगोभी में 33.33 प्रतिशत, मिर्चा में 61.74 प्रतिशत, करेला में 79.10 प्रतिशत, ककड़ी में 55.56 प्रतिशत, प्याज में 50 प्रतिशत, आलू में 55 प्रतिशत मूली में 76.10 प्रतिशत, शकरकन्द में 60.32 प्रतिशत टमाटर में 78.51 प्रतिशत सिंचाई जल की बचत की जा सकती है | इसी प्रकार केला में 48.89 प्रतिशत, अंगूर में 47.2 प्रतिशत पपीता में 68 प्रतिशत तथा तरबूजा में 65 प्रतिशत सिंचाई जल की बचत की जा सकती है |

जल उपयोग क्षमता

फसल की जल उपयोग क्षमता (क्विंटल / हेक्टेयर / से.मी.)पर भी टपकाव सिंचाईका काफी अच्छा प्रभाव पड़ता है | गणना के आधार पर प्राप्त, पारम्परिक एवं टपकाव सिंचाई द्वारा विभिन्न फसलों की जल उपयोग क्षमता को तालिका -2 में दिखाया गया है | जिससे यह विदित होता है कि टपकाव सिंचाई के प्रयोग से बैगन की फसल में 318.20 प्रतिशत, फूलगोभी में 141.27 प्रतिशत, मिर्चा में 284.62 प्रतिशत, करेला में 614.29 प्रतिशत, ककड़ी में 224.14 प्रतिशत, प्याज में 140 प्रतिशत, आलू में 265.52 प्रतिशत, मुली में 378.26 प्रतिशत, शकरकन्द में 258.2 प्रतिशत एवं टमाटर में 567.74 प्रतिशत, जल उपयोग क्षमता में वृद्धि प्राप्त की गई | जब कि फलों जैसे केला, अंगूर, पपीता, तथा तरबूजा में क्रमश: 175.23, 132, 433, एवं 242.37 प्रतिशत की वृद्धि पाई गई |

ड्रिप सिंचाई प्रणाली

निष्कर्ष

उपरोक्त परिणामों के अनुसार नि:संदेह टपकाव सिंचाई      विधि पारम्परिक सिंचाई विधि की तुलना में काफी अच्छा होता है | इसके प्रयास से न केवल फसल उत्पादन में वृद्धि होती है, बल्कि उपज की गुणवत्ता भी काफी अच्छी होती है | साथ ही साथ उर्वरक की बचत, खरपतवार पर नियंत्रण एवं मजदूरी की काफी बचत भी होती है | खासकर ऐसे जगहों के लिए, जहाँ पर भूमिगत जल काफी नीचे होता है, और नलकूप आदि लगाना सम्भव नहीं होता है, उन जगहों पर कुएं, तलाब या छोटे आकार के गड्ढों में पानी एकत्र कर, इस विधि से बागवानी एवं सब्जियों की खेती सफलतापूर्वक सम्पन्न की जा सकती है |


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