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अंगूर की खेती | आधुनिक खेती | अधिक पैदावार 2020-21 gain production free

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उपोष्ण क्तीबंधीय क्षेत्रों में अंगूर की खेती

भारत में अंगूर की खेती अदभुत है क्योंकी, यह उष्ण और शीतोष्ण सभी प्रकार की जलवायु में किया जा सकता है | हलाकि अंगूर की अधिकांशत: व्यवसायिक खेती (85 प्रतिशत खेती में) उष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्रों में (महारास्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश और तमिलनाडु) तथा उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले उत्तरी राज्यों में विशेष रूप से की जा रही है | जून के महीने में देश के उष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्रों से ताजाअंगूर उपलब्ध नहीं होते हैं | अत: उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्रों जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा दिल्ली व राजस्थान के कुछ भागों में अंगूर की खेती की जा रही है,जिससे जून माह में अंगूर मिलते हैं |

मृदा एवं जलवायु की आवश्यकता  

अंगूर की खेती के लिए शुष्क व वर्षा रहित गर्मी तथा अति ठण्ड वाले सर्दी के मौसम की आवश्यकता होती है | मई – जून के दौरान फलों के पकते समय वर्षा का होना नुकसानदायक है | इससे फल की मिठास में कमी आती है, फल असमानरूप से पकता है चटक जाता है | अंगूर के खेती के लिए अच्छी जल – निकास वाली मिट्टी बेहतर मानी जाती है | अंगूर की खेती अलग – अलग प्रकार की एसी मिट्टी में की जा सकती है जिसमे उर्वरक का प्रयाप्त उपयोग किया हुआ हो ओर इसकी अच्छी देखभाल की गयी हो |

रेतीली तथा बजरीदार मिट्टी में भी अंगूर की अच्छी फसल प्राप्त की जा सकती है | सामान्यत: 2.5 मीटर गहराई तक की मिट्टी आदर्श मानी जाती है | इसका पीएच मान 6.5 से 8 होना चाहिए | विनिमयशील सोडियम की दर 15 प्रतिशत से अधिक नही होनी चाहिए | किसानों को 0.3 प्रतिशत तथा अधिक लवणता वाली मिट्टी में अंगूर की खेती नहीं करनी चाहिए | समस्याग्रस्त क्षेत्रों में अंगूर की खेती के लिए साल्टक्रीक, दगरिज और 1613 लवण सहिष्णु मूलवृतों के प्रयोग का सुझाव दिया जाताहै जिनका प्रयोग निचे दर्शाई गयी किस्मों की मूलवुत रोपण के लिए किया जा सकता है | 

भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान द्वारा जारी / सिफारिस की गई किस्में अंगूर की खेती के

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पूसा उर्वशी :

शीघ्र पकने वाली (जून के द्रीतीय सप्ताह), गुच्छे ढीले, बड़े जिसमे मध्यम अंडाकर लगे होते हैं | फलों का रंग हल्का हरारंग लिया होता है बीज रहित फल जो ताजा खाने तथा किशमिश बनाने के लिए उपुक्त है | कुल घुलनशील शर्करा का स्तर 18-22 प्रतिशत रहता है |

पूसा नवरंग :

यह किस्म भी जून के प्रथम तथा दुसरे सप्ताह में पककर तैयार हो जाती है | दानो में बीज रहते है, गुच्छों का आकार मध्यम (180-240 ग्राम), गहरे काले – बैंगनी रंग के होते है | इसके फलों के त्वचा तथा रस का रंग गहरा बैंगनी होता है | यह किस्म जूस तथा रंगीन सराबके लिए उपयुक्त है | फलों में कुल घुलनशील शर्करा का स्तर 18-20 प्रतिशत रहता है | 

पूसा सीडलेस :  

यह जून के तीसरे सप्ताह में पककर तैयार हो जाती है | इसके गुच्छे मध्यम से लमबे आकर के गठीले होते है | दाने सरस, छोटे, बीज रहित और हरापन लिये हुए पीले रंग के होते है | गूदामुलायम मीठा होता है कुल घुलनशील शर्करा क स्तर 20-22 प्रतिशत रहता है |

ब्यूटी सीडलेस :

यह किस्म कैलिफोर्निया से लायी गयी है तथा जून के प्रथम सप्ताह में पककर तैयार हो जाती है | गुच्छे शंक्वाकार 9 छोटे से मध्यम आकर के होते है इसके दाने सरस, छोटे गोल, गहरे कारक से लगभग काले रंग के होते है | फलों का गुदा मुलायम और हल्का सा अम्लीय रहता है तथा छिलका माध्यम मोटा होता है | फलों में कुल घुलनशील शर्करा का स्तर 18-19 प्रतिशत होता है | फल बीज रहित होते है अतः खाने के लिए उपयुक्त रहती है |

पर्लेट :

इस किस्म का विकास भी कैलिफोर्निया में किया गया था | यह किस्म भी शीघ्र पकने वाली है जो जून के दुसरे सप्ताह में पक जाती है | गुच्छे मध्यम से लम्बे तथा गठे हुए होते है इसका फल सरस, हरा, मुलायक गुदे और पतले छिलके वाला; बीज रहित होता है | इसमें कुल घुलनशील शर्करा का स्तर 20-22 प्रतिशत तक रहता है | इसमें जिब्रेलिक अम्ल के उपचार से फलों का अकार बढ़ाया जा सकता है |

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प्रवर्धन अंगूर की खेती में

अंगूर की प्रजातियों का प्रवर्धन सामान्यरूप से तने की कलम से किया जाता है | जिसको शीत ऋतू जनवरी मध्य में निकलना चाहिए जब पौधों से सारे पत्ते गिर जाये एवं बेल सुषुप्त अवस्था में चले जाये कलमो की मोटाई पेन्सिल के आकार, लम्बाई 20-25 सेमी. जिसमे 3-4 स्वस्थ गांठे हो उपयुक्त राहती है| यदि पौधों को मूलवृन्त पर बनाने के लिए वेज ग्राफ्टिंग से पौधे जनवरी-फ़रवरी में तैयार किये जा सकते है| इस कार्य को जुलाई अगस्त में किया जा सकता है |

रोपण

बेलो के बीच उचित दुरी रखने के लिए रोपण से पहले किसानो को एक ले-आउट योजना तैयार कर लेना चाहिए | सामान्य तौर पर यह दुरी इस प्रकार राखी जाती है – हैड सिस्टम(सिर प्रणाली) में 2×2 मीटर ट्रेलिस सिस्टम( सलाखें प्रणाली) 3×3 मीटर बावर सिस्टम(कुंज प्रणाली) 4×4 मीटर तथा वाई प्रणाली में 3×3 मीटर

नवम्बर दिसंबर के दौरान 75 सेमी.x 75 सेमी. आकार के गड्ढ़े खोदकर उनमे 10 किलो गोबर की खाद और 1 किलो नीम की खली को मिट्टी के साथ 1:1 अनुपात में मिला देना चाहिए |

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बेलों की सधाई (ट्रेनिंग) अंगूर की खेती में

बॉवर, परगोला अथवा पंडाल :

पौधों को 2 मीटर की ऊचाई एकल तने के रुप में बढ़ने दिया जाता है तथा उसके उपरांत लता को मंडप के ऊपर सभी दिशाओं में फैलने दिया जाता है | यह लता मंडप 12 गेज वाली तारों से जाली के रूप में बुना जाता है और इस जाली को एगल आयरन, पत्थरों या लकड़ी के खंम्भों के सहारे फैलाया जाता है | बेल की मुख्य सखाओं को इस प्रकार बढ़ायाजाता है कि वे प्रत्येक से लगभग सामान दुरी पर रहें | इन मुख्य टहनियों पर फल देने वाली शाखाओं को बढ़नेदिया जाता है और इनकी कटाई-छंटाई प्रतिवर्ष की जाती है |

ट्रेलिस प्रणाली :

यह अर्ध प्रबल किस्मों के लिए उपयुक्त रहता है | पौधे 3 मी. x 3 मी. दुरी पर रोपेजाते है तथा लता की सखाओं को तार पर 2 स्तरों पर फैलने दिया जाता है | लोहे की खंभों की मदद से तार क्षैतिज बांधे जाते हैं पतला भू-सतह से 34 मी. की ऊचाई पर दूसरा पहले से 24] सेमी. ऊपर रखा जाता है | शाखाओं को मुख्य तने के दोनों ओर फैलने दिया जाता है |

वाई (Y) ट्रेलिस प्रणाली :   

   इस प्रणाली में अंगूर की बेलों को विभाजित कर खुली वितान (केनोपी) पर बढ़ने दिया जाता है Y के आकार वाले एंगल ट्रेलिस पर 120-130 सेमी. की ऊचाई पर बांधे गए तारों पर फलदार शाखाओं को बढ़ने दिया जाता है | सामान्यत: एंगल 100-110 डिग्री कोण का होता है जिसकी शाखाएं 90-120 सेमी. तक फैला होती है | इस प्रणाली की सबसे लाभदायक बात यह है कि इसमें फल गुच्छों को सीधी तेज धुप से बचाया जा सकता है |

अंगूर की बेलो की छंटाई

उत्तर भारत में शीतऋतू मे तापमान बहुत कम हो जाने के कारण मध्य दिसंबर से मध्य जनवरी के दौरान बेलें निष्क्रिय अवस्था में चले जाते है | इस समय उत्तर भारत में छटाई उपयुक्त रहती है | परन्तु उष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले प्रदेशो में (महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा तमिलनाडु) में दोहरी कटाई छटाई की जा सकती है फल देने वाले बेलों की छटाई सामान्यतः रोपण के 2-3 वर्ष पश्चात् बेल को वांछित आकृति देनी चाहिए| चूँकि अंगूर के गुच्छे पत्येक मौसम में बेल से फूटने वाली नई टहनियों पर फैलाते है, अतः पिछले वर्ष की टहनियों की निश्चित लम्बाई तक छटाई करना महत्वपूर्ण होता है | किस गाँठ तक बेल को छांटा जाये यह किस्म की प्रबलता पर निर्भर करता है |

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अंगूर की कुछ किस्मो में छटाई की सीमा

प्रति केन कलियों की संख्या किस्मे
2-3ब्यूटी सीडलेस
3-4पर्लेट, डीलाईट
4-6पूसा उर्वसी, पूसा नवरंग, हिमरोड
9-12पूसा सीडलेस, किशमिश चरनी, थोमसन सीडलेस

कांट-छाँट के बाद बेलो पर 0.2% ब्लाईटोक्स का छिडकाव करना चाहिए | पौधे के आधार पर दिखाई पड़ने वाले सभी अंकुरों को हाथ से हटा देना चाहिए |

खाद एवं उर्वरको का प्रयोग अंगूर की खेती में

अंगूर के पौधों को पोषक तत्वों की आधी खुराक मिटटी के माध्यम से तथा शेष आधी पत्तियों पर छिड़काव करके दिए जाने की सिफारिस की जाती है | विशेषकर नव विकसित पत्तीओं पर सुबह के समय यूरिया (2% वाले घोल) के छिड़काव की सिफारिस की जाती है | प्रति पौधा 25 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद को फ़रवरी माह में मिटटी में मिलाना चाहिए | छटाई के तुरंत बाद बेल में 200 ग्राम पोटेशियम सल्फेट 250 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट तथा 250 ग्राम अमोनियम सुल्फेट डालना चाहिए | फल लगने शुरू होने के पश्चात अप्रैल माह में 200 ग्राम पोटेशियम सल्फेट की दूसरी खुराक का प्रयोग किया जाता है | लोहा तथा जिंक जैसे शुक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को दूर करने के लिए इनका 0.2 % की दर से छिड़काव किया जाता है |

सिंचाई अंगूर की खेती में

नयी रोपी गयी बेलो को रोपण के तुरंत बाद पानी देना आव्श्यक है | खाद एवं उर्वरक देने के पश्चात् भी सिंचाई आवश्यक है | तापमान में वृद्धि के साथ 10-15 दिनों के अन्तराल पर सिंचाई की जानी चाहिए | फलों के रंग बदलाव तथा परिपक्वता के समय अन्तराल में बढ़ोतरी करनी चाहिए जिसमे फलों में शर्करा संचित की जा सके | ड्रिप सिंचाई विधि से अच्छे लाभ मिलते है | बसंत एवं ग्रीष्म में प्रति बेल 3.5 लीटर जल क्षमता वाली 15 सिंचाईयो की आवश्यकता पड़ती है |

पादप जैव विनियामको एवं शश्य क्रियाओ द्वारा फलों की गुणवत्ता में सुधार

जनवरी के प्रथम सप्ताह में छंटाई के तुरंत पश्चात् अंगूर की बेलो पर डार्मेक्स अथवा डॉरब्रेक (30ML) का एक छिड़काव करना चाहिए | इसमें बेलों में जल्दी गाँठ फुट जाती है और फल भी जल्दी पकते है या छंटाई के उपरांत निष्क्रिय कलियों पर 20 ग्राम थायो यूरिया प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 3 छिड़काव करने से कलियाँ एक सप्ताह पहले खिल जाती है |

अंगूर की खेती में अंगूर की लम्बाई बढ़ाने के लिए पुष्प गुच्छों के आधा खिलने के समय उन्हें जिब्रेलिक अम्ल के (4.45पीपीएम- ब्यूटी सीडलेस तथा 25-30 पीपीएम- पर्लेट, पूसा उर्वशी, तथा पूसा सीडलेस ) में डुबोना चाहिए|

अंगूर जब मटर के दाने के बराबर होने पर दूसरा उपचार करना चाहिए | जब फल का रंग बदलने के पास हो तो गुच्छों को एक मिली इथ्रेल अथवा इथेफान प्रति ४ लीटर पानी में मिलाकर बनाये गये घोल में डुबोया जा सकता है |

फल की गुणवत्ता में सुधार के लिए मुख्य तने की गरडेलिंग और गुच्छों में अंगूरों की सघनता कम करने जैसी क्रियाएं थिनिंग भी लाभप्रद पाई गई है | ब्रशिंग अथवा कैंची द्वारा पुष्पक्रम को एक तरफ से फलों को पूरी तरह हटाकर गुच्छों की थिनिंग की जाती है |

किटनाशी जीवों एवं बिमारियों का नियंत्रण अंगूर की खेती में

रोग नियंत्रण
पत्ती लपेटक इल्लियाँ लीफ हॉपर २ मिली. मेलाथियान अथवा डाईमेथोयेट को प्रति लिटर पानी में मिलाकर छिडकाव करें |
दिमक५ मिली. क्लोरोपाईरीफॉस प्रति लीटर पानी में मिलाकर १५-२० दिन के अन्तराल पर मिट्टी में डाले तथा तना में डाले |
चूर्णिक फफूंद तथा एथ्रेकनोज जून सितंबर के दौरान १५ दिन के अन्तराल पर ३ ग्राम ब्लाईटोक्स अथवा बेविस्टीन को प्रति लीटर पानी मिलाकर छिड़काव करें |

अंगूर की खेती में तुड़ाई

गुच्छों को पूरी तरह पकने पर तोड़ना चाहिए | फलों का पकना वांछित टीएसएसव अम्लता की अनुपात से माना जाता है | जो 25-30 के बीच में रहता है |   

स्त्रोत –https://hi.vikaspedia.in/agriculture/crop-production  


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