अनार की खेती

अनार की खेती | कैसे करें| जैविक खेती

शेयर करें

कम समय और कम पैसे में ज्यादा कमाई का सपना हर किसी का होता है मगर राज्यों के किसानो की बात करे तो पहली नजर में ये मुश्किल ही नजर आता है ऐसे में जरुरी ये है की ऐसी फसल में ध्यान दिया जाये जिसमे खर्च कम और लम्बे समय तक के लिए कमाई होती रहे अनार की खेती इन्ही में से एक है अनार की खेती में लाखोँ तक की कमाई की जा सकती है और दिलचस्प बात ये है की इसमें ज्यादा खर्च नही करना पड़ता तो अगर आप भी अनार की खेती करने के बारे में सोच रहे है तो किन किन बातो पर खास तौर पर ध्यान देना चाहिए आइये जानते है |

अनार की खेती भारत की एक मुख्य फलदार फसल है अनार की खेती महाराष्ट्र, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, पंजाब, कर्नाटक, गुजरात और मध्यप्रदेश आदि राज्यों में मुख्य रूप से की जाती है अनार बहुत ही पौष्टिक और गुणकारी फल है अनार में विटामिन ए,सी,ई फोलिक एसिड एंटी ओक्सिडेंट होता  है और कई औषधीय गुणों से भरपूर है

अनार की खेती के लिए जलवायु एवं भूमि

आपको अनार की खेती करने के पहले ये ध्यान देना चाहिए की जलवायु शुष्क होना चाहिए मिटटी में दोमट मिटटी बहुत ही बढ़िया होती है |

अनार की खेती के लिए उन्नत की प्रजातियाँ

हमारे देश में अनार की कुल 25 किस्मे मौजूद है किसान इलाके के जलवायु के अनुसार किस्म का चुनाव करे |

anar ki ganesh kism
1.गणेश किस्म

अनार की खेती में अरक्ता किस्म
अरक्ता किस्म
अनार भगवा किस्म
भगवा किस्म
अनार की सोलापुर लाल किस्म
सोलापुर लाल

अनार का पौधा तीन चार साल में फल देने लगता है और एक पेड़ करीब 25 वर्ष तक फल देता है साथ ही अब तक के अनुसन्धान के मुताबिक प्रति हेक्टेयर उत्पादकता बढ़ाने के लिए अगर 2 पौधों के बीच की दुरी को कम कर दिया जाये तो प्रति पेड़ पैदावार बढ़ जाता है परम्परागत तरीके से अनार की पौधों की रोपाई करने पर एक हेक्टेयर में लगभग 400 पौधे ही लग पाते है जबकि नये अनुसन्धान के अनुसार 3×3 मीटर की दुरी से पौधे की रोपाई की जाये तो पैदावार दो से तीन गुना बढ़ जायेगा |

परम्परागत बागवानी की तुलना में सघन बागवानी से 2-3 गुना अधिक उत्पादन मिलता है बरसात अधिक भी होने से अनार की खेती बर्बाद नही होता |

अनार का पेड़

खेत की तैयारी और पौध रोपण

पौध रोपण के लिए अनार की खेत की तैयारी मई माह में सामान्य रूप से करे सघन बागवानी के लिए खेत में आमतौर पर परम्परागत तरीके से ही की जाती है सिर्फ रेखांकन में पौधों से पौधों और कतार से कतार की दुरी को कम किया जाता है रोपाई के लिए गड्ढो की तयारी मई माह में की जाती है मई माह में उचित दुरी पर गड्ढो को खोदकर छोड़ देना चाहिए |

पौध रोपण के एक माह पूर्व 60 सेमि की लम्बाई चौडाई तथा गहराई के अकार में गड्ढे खोदकर 15 दिनों तक खुला छोड़ दे जिसके बाद गड्ढे के उपरी मिटटी में 15 किलोग्राम गोबर की पकी हुई खाद यूरिया 60 ग्राम, डी ए पी 50 ग्राम, पोटाश 30 ग्राम डालकर सतह से 15 सेमि ऊचाई तक भर दे गड्ढे भरने के बाद सिंचाई करे ताकि मिटटी अच्छी तरह से जैम जाये इसके बाद पौधों का रोपण करे |

रोपण के तुरंत बाद सिंचाई करना नहीं भूले ड्रिप सिंचाई अनार के लिए अच्छी साबित हुई है इसमें 43 % पानी की बचत एवं 30-35 % उपज में वृद्धि पायी गयी है ड्रिप द्वारा सिंचाई विभिन्न मौसम में उसके आवश्यकता के अनुसार करनी चाहिए पौधों की ऊँचाई लगभग 6 से 7 फिट तक रखनी चाहिए इसकी कटाई छटाई शुरू कर देनी चाहिए मेन स्टैंड 2 या 3 देकर रखे अगर मेन स्टैंड के निचे छोटे छोटे कल्ले आ जाये तो उसको हटा देना चाहिए और जो कल्ले नहुत तेजी से भाग रहे है वो उपयुक्त नहीं है उसको भी कटाई छटाई करते रहे

  • मुख्य तने पर भूमि की सतह से 60 से 70 सेमी तक कोई भी साखा नही रखनी चाहिए |
  • प्रति पौधे की 2 से 3 शाखा छोड़ अन्य शाखाओं को काट कर अलग कर दे |
  • चुनी हुयी सखाओं में 3 से 4 माह में नए कल्ले आने लगते है |
  • मृग बहार ( जून जुलाई माह ) वाले फलों को लेना उचित रहता है |

अमरुद की खेती की तरह ही अनार की खेती में 2 से 3 बार भूल उगते है शुरुवाती दौर में यदि फल फट रहे है तो आपको समझ जाना चाहिये की इसमें बोरोन की कमी है जैसे ही फल पके आपको पानी कि व्यवस्था करनी चाहिए गर्मी के दिन में हफ्ते में दो बार पानी की आवश्यकता होती है और ठंडी में एक बार भी हफ्ते में पानी देंगे तो चल जायेगा |

सबसे लाभ की बात ये है की आप एक पौधे में लगभग 50 से 200 तक फल ले सकते है अगर इसकी सुरक्षा सही ढंग से की जाए अगर आप इसकी कटाई छटाई नही करते ठीक से इसका उपचार नहीं करते तो फिर ये 50 से 200 के आसपास नही दे सकेगा और इसकी क्वालिटी भी ख़राब निकलती है |

अनार का फुल

अनार का प्रवर्धन

गुटी द्वारा

इसमें आपको 1 से 2 सेमी तक का गोल रिंग बनाना होता है रिंग बनाकर ऊपर का cover हटा लें और अन्दर से मजबूत और हार्ड लकड़ी आ जाती है ध्यान रहे की जब आप रिंग बना रहे हो तो उसका अंदरूनी भाग डैमेज न हो पौधे के तने में का परत और उसका नीचल परत पूर्ण रूप से हट जानी चाहिए यदि कही से भी जुडी रह जायेगा तो गुटी में जड़ नहीं आएगा और गुटी ख़राब हो जाएगी गुट बनाने के बाद गुटी की जगह पर मिटटी और सड़ी गोबर की खाद को बराबर मात्रा में मिलाकर गूँथ दे इसके बाद इसको पोलीथिन लगाजर कवर कर दे इसके पश्चात् सुतली से अच्छी तरह से बाँध दे कही से भी कोई भाग खुला नहीं रहना चाहिए जिसके फलस्वरूप आप अनार का प्रवर्धन कर सकते है |

कलम द्वारा

जब अनार की कटाई छटाई कर रहे होते है उस समय कलम बना लेना चाहिए सबसे पहले शरोता से छोटे अनार के पौधे को काट ले ज्यादा मोटाई का ताना ना ले कलम बनाते समय यह ध्यान रखें की कलम की लम्बाई 15-20 सेमी रहे और मोटाई पेन्सिल की आकार का रहे इसको पोलीथिन के अन्दर मिटटी में 1 से 1.5 इंच अन्दर गाड़ दे इससे आपका एक अनार का कलम मिल जायेगा इसको बनाने के लिए आपको कोकोपिट 3 भाग परलाईट 1 भाग और वेर्मिकुलाइट 1 भाग का मिश्रण मिलाने से कलम जल्दी उगता है |

खाद एवं उर्वरक

अनार की खेती में खाद एवं उर्वरक
खाद एवं उर्वरक

अनार की खेती को बेहतर विकास के लिए निम्न पोषक तत्वों की आवश्यकता है:

  • i. प्रमुख पोषक तत्व: नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश
  • ii. द्वितीयक पोषक तत्व: कैल्शियम, सल्फर और मैग्नीशियम
  • iii. सूक्ष्म पोषक तत्व: जिंक, लोहा, मैगनीज, बोरॉन, कॉपर, मॉलीब्लेडनम्, क्लोरीन, आदि।

1.नायट्रोजन

मुख्यत:नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए यूरिया, फोस्फोरस की पूर्ति के लिए डीएपी, एसएसपी या एनपीके और पोटाश की पूर्ति के लिए एमओपी या एनपीके का प्रयोग किया जाता है। वहीं ज़िंक की पूर्ति के ज़िंक सल्फ़ेट आदि का प्रयोग किया जाता है। इन उर्वरकों की गुणवत्ता की जांच निम्न प्रकार कर सकते है।

यूरिया:यह सफेद चमकदार, लगभग समान आकार के गोल दाने होते हैं। यह पानी में पूर्णतया घुलनशील होता है। इसके घोल को छूने पर ठंडक का अनुभव होता है। इसके दानों को गर्म तवे पर रखने पर वह पिघल जाते है और आंच तेज करने पर कोई अवशेष नही बचता है।

डीएपी:इसके दाने सख्त, भूरे, काले या बादामी रंग के होते है। इसकी गुणवत्ता की पहचान के किए डी.ए.पी. के कुछ दानों को हाथ में लेकर उसमे चुना मिलकर तम्बाकू की तरह रगड़ने पर इसमें से तीक्ष्ण गन्ध निकलती है, जिसे सूंघना काफी मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा डीएपी के कुछ दानों को पक्के फर्श पर रगड़ने पर वह टूटते नहीं केवल रगड़ खाते है। यदि इसके दानों को तवे पर धीमी आंच में गर्म किया जाए तो इसके दाने फूल जाते है।

2.फोस्फोरस

एसएसपी:यह सख्त, दानेदार, भूरे, काले या बादामी रंग के होते है। यह चूर्ण के रूप में भी उपलब्ध होता है। इस दानेदार उर्वरक की मिलावट मुख्यत: डी.ए.पी. व एन.पी.के. मिक्चर उर्वरकों के साथ की जाने की सम्भावना बनी रहती है।

3.पोटेशियम

एमओपी:यह सफेद पिसे नमक तथा लाल मिर्च जैसा मिश्रण होता है। इसके कण नम करने पर आपस में चिपकते नहीं है। पानी में घोलने पर खाद का लाल भाग पानी में ऊपर तैरता है।

अनार की खेती से उगे पेड़

अन्य

जिंक सल्फेट:जिंक सल्फेट में मैंग्नीशिम सल्फेट प्रमुख मिलावटी रसायन है। भौतिक रूप से समानता के कारण नकली असली की पहचान कठिन होती है। इसकी गुणवत्ता की जाँच के लिए इसके घोल को डी.ए.पी. के घोल में मिलाने पर थक्केदार अवक्षेप बन जाता है। मैग्नीशियम सल्फेट के साथ ऐसा नहीं होता। इसके अलावा जिंक सल्फेट के घोल में पतला कास्टिक का घोल मिलाने पर सफेद, मटमैला मांड़ जैसा अवक्षेप बनता है, जिसमें गाढ़ा कास्टिक का घोल मिलाने पर अवक्षेप पूर्णतया घुल जाता है। यदि जिंक सल्फेट की जगह पर मैंग्नीशिम सल्फेट है तो अवक्षेप नहीं घुलेगा।

उर्वरक के उचित प्रयोग और अधिक लाभ के लिए संतुलित मात्रा में उचित समय पर प्रयोग करना बहुत जरूरी है। प्रयोग किए गए उर्वरक से फसल अधिक से अधिक उपज दे और कम से कम पोषक तत्वों की हानि हो इसके लिए हमें उर्वरकों की उपयोग क्षमता को बढ़ाना होगा। उर्वरकों की उपयोग क्षमता को बढ़ाने के लिए अग्रलिखित बातों का ध्यान रखें।

सही उर्वरक का चुनाव:

उर्वरकों का चुनाव मृदा परीक्षण के आधार पर करें। जिस तत्व की कमी हो उस मृदा में उसी तत्व की पूर्ति के लिए उर्वरक का प्रयोग करें।

नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए नीम लेपित यूरिया का प्रयोग करें।

मृदा में फास्फोरस की अत्यधिक कमी की दशा में पानी में घुलनशील फास्फोरस युक्त उर्वरकों का प्रयोग करें।

कम अवधि की फसलों का शीघ्र उपलब्धता वाले उर्वरकों एवं लम्बी अवधि की फसलों में धीरे-धीरे पोषक तत्व प्रदान करने वाली खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। लम्बी अवधि की फसलों में साइट्रेट घुलनशील एवं कम अवधि की फसलों में पानी में घुलनशील फास्फेटिक उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए।

खेत में जो फसल उगाने जा रहे हैं, उससे पहले कौन-सी फसल उगाई गई थी एवं उसमें कितनी मात्रा में खाद का प्रयोग किया गया था, खेत खाली था या नहीं, आदि बातों को ध्यान में रखते हुए खाद एवं उर्वरकों का चुनाव करें।

कम नमी वाली मृदाओं में नाइट्रेट युक्त नाइट्रोजनधारी उर्वरकों तथा सिंचित एवं अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में मृदा में अमोनिकल या एमाइडयुक्त नाइट्रोजनधारी उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए।

नम क्षेत्रों में कैल्शियम एवं मैगनिशियम युक्त उर्वरकों का प्रयोग करें। क्योंकि इस दशा में मृदा में इनकी कमी हो जाती है।

अम्लीय मृदाओं में क्षारीय प्रभाव छोड़ने वाले नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों का प्रयोग करें साथ ही फोस्फोरस की पूर्ति के लिए घुलनशील फास्फेटिक उर्वरकों का प्रयोग करें। लवणीय मृदाओं में अम्लीय पक्रृति वाले उर्वरकों का प्रयोग करें।

रेतीली मृदाओं में जैविक खादों का अधिक से अधिक प्रयोग करें जिससे कि पोषक तत्वों की निक्षालन द्वारा कम से कम हानि हो तथा ऐसी मृदाओं में नाइट्रोजनधारी उर्वरकों का घोल बनाकर खड़ी फसल पर छिड़काव करें। चिकनी मृदा में जैविक खादों का प्रयोग अधिक मात्रा में करना चाहिए।

उर्वरकों का प्रयोग (कब और कैसे):

गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद जैसे कार्बनिक खादों को बुवाई से पहले खेत में अच्छे ढंग से मिला देना चाहिए।

फास्फेटिक एवं पोटाशिक उर्वरकों की पूरी मात्रा बुवाई के समय ही खेत में प्रयोग कर अच्छी तरह मिट्टी में मिला दें।

नाइट्रोजन, फास्फेटिक एवं पोटेशिक उर्वरकों को बुवाई के समय खेत में बीज से 3-4 सेंमी नीचे तथा 3-4 सेंमी बगल में डालना चाहिए। फास्फोरस, पोटेशियम, कैल्शियम, मैगनीशियम, लोहा व जस्ता को सदैव पौधों की जड़ो के पास प्रयोग करें।

उर्वरकों को घोल के रूप में खड़ी फसल पर छिड़कने से पोषक तत्वों को निक्षालन, गैसीय, स्थिरीकरण, डिनाइट्रीकरण आदि द्वारा होने वाली हानि से बचाया जा सकता है।

साभार सौजन्य:- www.krushisamrat.com

सुन्दर अनार

अनार की खेती में सधाई

अनार की अच्छी फसल के लिए सधाई बहुत ही महत्वपूर्ण प्रोसेस है इसको दो प्रकार से किया जाता है पहला है बहुतना पद्धति और दूसरा है एकल तना पद्धति

बहुतना पद्धति – इसमें इस प्रकार से सधाई किया जाता है की ताना दो तीन हो एक पौधे में और बाकी तनो को काट दिया जाता है जिससे इसमें सूर्य की किरने अच्छी तरह से पड़ती है और पौधे जल्दी बढ़ते है

एकल तना पद्धति – एकल तना पद्धति में सिर्फ एक तना को रखा जाता है बाकि निचे के तनो को काट लिया जाता है सिर्फ एक तना को मुख्य रूप से बढ़ाया जाता इसमें तना में बीमारी आती है ये अधिक उत्पादन के लिए सहायक नही है |

छटाई

अनार के पौधों में आधार से अनेक शाखाये निकलती है | यदि इनको समय समय में ना निकला जाये तो अनेक मुख्य तने बन जाते है जिससे उपज तथा गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है उपज तथा गुणवत्ता की दृष्टि से प्रत्येक पौधों में 3-4 मुख्य तने ही रहना चाहिए तथा शेष को समय समय पर निकालते रहना चाहिए |

  1. पेन्सिल की मोटाई वाले सभी तनो या शाखा को आप छटाई कर सकते है आपको सभी कमजोर शाखाओ को काटना चाहिए क्योकि आने वाले सीजन में इनमे फुल नहीं होंगे या होंगे भी तो इनको प्रॉपर फल नहीं मिल पायेगा
  • इस प्रक्रिया में आपको अनार के मरते हुए या जिसमे बीमारी लगने लगे है उसको कटाई करना चाहिए जो शाखा सुख रही है या जिनमे कोई बीमारी लगी हुई है उनको काट के अलग करना रहता है |

बहार नियत्रण

अनार में हर साल फूल आते रहते है लेकिन इसके मुख्य तीन मौसम है जिन्हें अम्बे बहार (जनवरी फ़रवरी ) मृग बहार (जून जुलाई ) और हस्त बहार (सितम्बर अक्टूबर ) कहते है

वर्ष में कई बार फुल आना व फल लेते रहना उपज एवं गुणवत्ता की दृष्टि से ठीक नही रहता शुष्क क्षेत्र में पानी की कमी तथा यहाँ की जलवायु के अनुसार मृग बहार की फसल लेने की संसतुत की जाती है इसमें जून जुलाई में फुल आते है तथा दिसम्बर जनवरी में फल तुड़ाई के लिए उपलब्ध हो जाते है अर्थात अधिकतर फल विकास वर्षा ऋतू में पूर्ण हो जाता है | अवांछित बहार नियत्रण के लिए कुछ समय पहले मार्च से मई में सिंचाई बंद कर देते है कुछ रसायनों जैसे थायोयूरिया, इथ्रेल आदि 1ml/लीटर पानी के पर्णीय छिड़काव द्वारा भी पतझड़ लाकर यह कार्य किया जा सकता है |

अनार की खेती में रोग एवं किट प्रबंधन

रोग लक्ष्ण उपाय
पत्ती व फल धब्बा रोगयह एक फफूंद जनित रोग है इसमें पत्तिय एवं फलों के ऊपर फफूंद के भूरे धब्बे दिखाई देते है जिससे फलों के बाजार भाव में गिरावट आ जाती हैकार्बेन्डाजिम(1ML/लीटर) या मेन्कोजेब(२.५gm/लीटर) या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (२.५gm/लीटर) या थायोफिनेट मिथाईल (१.५ml/लीटर) का 15-20 के अन्तराल पर दो छिडकाव धब्बे दिखाई पड़ते ही करना चाहिए |
फल सड़न रोगफल काले पड़कर सड़ जाते हैफुल आने के समय तथा उसके 20 दिन बाद ऊपर के दवा में से किसी एक दवा का चिढ़काव करना चाहिए
फाईटोप्थोरा ब्लाईटवर्षा ऋतू में वातावरण में नमी अधिक होने पर पत्ती, फुल तथा फल में सडन शुरू हो जाते हैरोग दिखाई देने पर मेटालेक्सिल ८ प्रतिशत + मेन्कोजेब 0.25 % दवा का छिडकाव करना चाहिए
रोग एवं नियंत्रण
अनार में रोग
किट लक्षण उपाय
उदईशुष्क क्षेत्र में अनार की पौध स्थापना में दीमक का प्रकोप एक गंभीर समस्या है | जड़ो एवं तनो मे अत्यधिक प्रकोप होता है जिससे पौधे सुख जाते हैसड़े हुए गोबर को ही पौधों में डालना चाहिए | ५० ग्राम कर्बेनिल चूर्ण व थिमेट का बुरकाव गड्ढे भरने से पहले अवश्य करना चाहिए | खड़ी फसल में क्लोरपाइरीफ़ॉस 2ml/लीटर घोल का प्रयोग करना चाहिए |
अनार की तितलीप्रौढ़ तितली द्वारा दिए गए अन्डो से निकली सुंडीयाँ फलों को छेदकर अन्दर प्रवेश करती है तथा फल के गुदे को खाती रहती है |प्रभावित फलों को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए तथा फास्फोमिडॉन 0.05% या कार्बेरिल (4ग्राम/लीटर) दवा का छिडकाव करना चाहिए
माईटप्रायः सफ़ेद एवं लाल रंग के अति सूक्ष्म जिव अनार के पत्तीओं के उपरी एवं निचले सतह पर शिराओ के पास चिपककर रस चूसते है जिससे पत्तियां ऊपर की तरफ मुड़ जाती है तथा अधिक प्रकोप होने पर सुखकर गिर जाती है |प्रकोप होते ही क्लोरपाइरीफ़ॉस (2ml/लीटर), इमिडाक्लोरपीड 0.04% या डाईक्लोरवास (0.05%) का छिडकाव करना चाहिए |
किट एवं नियंत्रण

फल की तुड़ाई एवं उपज

उचित देख रेख तथा उंनत प्रबंधन अपनाने से अनार से चौथे वर्ष में फल लिया जा सकता है परन्तु इसकी अच्छी फसल 6-7 वर्ष पश्चात् ही मिलती है तथा 25-30 वर्ष तक अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है एक विकसित पेड़ पर लगभग 50-60 फल रखना उपज एवं गुणवत्ता की दृष्टि से ठीक रहता है | एक हेक्टेयर में 600 पौधे लग पाते है इस हिसाब से प्रति हेक्टेयर 5-6 लाख रूपये सालाना आय हो सकती है | लागत निकालने के बाद भी लागत आकर्षक रहता है |


शेयर करें

headdead05@gmail.com

नमस्ते किसान भाइयो, मेरा नाम अनिल है और मै इस वेबसाइट का लेखक और साथ ही साथ सह-संस्थापक भी हूँ, Education की बात करें तो मै graduate हूँ, मुझे किसानो और ग्रामीणों की मदद करना अच्छा लगता है इसलिए मैंने आप लोगो की मदद के लिये इस वेबसाइट का आरम्भ किया है आप हमे सहयोग देते रहिये हम आपके लिए नयी-नयी जानकारी लाते रहेंगे | #DIGITAL INDIA

View all posts by headdead05@gmail.com →

One thought on “अनार की खेती | कैसे करें| जैविक खेती

प्रातिक्रिया दे