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अमरुद की खेती | आधुनिक खेती | कैसे करे ? amrud ki kheti

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परिचय

अमरुद की खेती करने से पहले ये जान ले अमरुद मिर्टेंसी कुल का पौधा है जो सिडियम वंश के अंतर्गत आता है, इसका वैज्ञानिक नाम सिडियम ग्वाजावा है | इसकी उत्पत्ति स्थान उष्ण कटिबंधीय अमेरिका को मन जाता है, भारत में इसका प्रवेश 17 शताब्दी में हुआ था | देश में यह फल इतना लोकप्रिय हो गया है की बहुत से व्यक्ति इसे यहीं का है समझने लगे है |

अन्य फलदार पौधों की तुलना में अमरुद की खेती से जुडी कुछ खास विशेषताएं जैसे विभिन्न प्रकार की भूमि तथा जलवायु में सफलतापूर्वक पनपने, कम समय में फलत, सहज फलन की प्रवृत्ति, आकर्षक रंग एवं स्वाद पोषक तत्वों से भरपूर, प्रायः स्थिर बाजार मूल्य, साल भर सहजता से कम दामो में उपलब्धता के कारण काफी पसंद किया जाता है | अमरुद की इन्ही विशेषताओं के कारण इसे ‘गरीब का फल’ अथवा ‘उष्ण जलवायु का सेब’ के नाम से भी जाना जाता है |

अमरुद ताजे रूप में खाने के अलावा कई मुल्यवर्धक उत्पाद जैसे जैम, जेल्ली, आर टी एस, आइसक्रीम, चीज, टॉफी इत्यादि बनाने के लिए भी उपयोग में लाया जाता है | इसके फलों में पैक्टिन की अधिकता होने के कारण उच्च गुणवत्ता की जैली बनाने में इसका उपयोग किया जाता है, यह एक महत्वपूर्ण फल है |

इसे यदि क्षेत्र या उत्पादन की दृष्टि से देखें तो देश में उगाये जाने वाले प्रमुख फलों में इसका पांचवा स्थान है, इससे पहले आम, निम्बुवार्गीय फल, केला एवं सेब का ही स्थान आता है | अमरुद की खेती लगभग सभी राज्यों मे की जाती है, मुख्य रूप से यह उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, पंजाब, महाराष्ट्र इत्यादि जिलों में व्यावसायिक रूप से उगाया जाता है

अमरुद का पोषक मान एवं महत्व

पोषक तत्वों के भरपूर होने के कारण इसके ‘फलों को गरीब का सेब’ कहा गया है, गुणों के मामले में इसके फल सेब से भी अच्छे माने गये है | बार्बेडोज चेरी एवं आवंला के बाद ‘विटामिन सी’ की मात्रा इसमें अन्य फलों की तुलना में अधिक पायी जाती है, फलों के अलावा इनकी पत्तियां भी उल्टी, दस्त के उपचार में लाभकारी पायी गयी है |

अमरुद की खेती के लिए जलवायु एवं भूमि

यह उष्ण तथा उपोष्ण जलवायु का फल है, इसके पौधे सूखे की दशा से कम प्रभावित होते है, लेकिन पाले से अधिक नुकसान होता है | अमरुद कि सफल खेती के लिए सामान्यतः 23-28 डिग्री सेल्सियस तापमान उत्तम पाया गया है, साथ ही ऐसे क्षेत्र जहाँ वार्षिक वर्षा 100-200 सेमी. वर्षा हो वहां पर उपजाने के लिए उपयुक्त रहते है |

अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में इसका उत्पादन नही किया जा सकता है, गुणवत्ता युक्त फलोत्पादन के लिए शुष्क ऋतू सर्वोत्तम रहती है, अमरुद की खेती विभिन्न प्रकार की मृदाओं में आसानी से की जा सकती है | सफल उत्पादन के लिए उचित जल निकास वाली, बलुई दोमट मृदा, जो की जीवांश पदार्थो से प्रचुर हो, उत्तम मानी गयी है |

पौधों की जड़े मृदा की उपरी सतह से खुराक अवशोषित करती है, इसके लिए मृदा की उपरी सतह उपजाऊ होनी चाहिए मृदा का PH मान 6.5 से 7.5 के मध्य सही होता है | परन्तु 8.2 PH मान तक वाली मृदाओं में भी इससे उत्पादन लिया जा सकता है | क्षारीय भूमि जिसका PH मान 7.5 से 9.5 तक हो उसमे अमरुद पर उकठा रोग का प्रकोप अधिक देखा गया है |

अमरुद की खेती में प्रवर्धन

सुन्दर अमरुद, अमरुद की खेती
अमरुद

अमरुद का प्रवर्धन बीज एवं वानस्पतिक विधिओं द्वारा आसानी से किया जा सकता है, बीज द्वारा तैयार किये गये पौधों में भिन्नता आ जाती है व फलों के आकार एवं गुण भी अलग अलग होते है | इसलिए यह जरुरी है की नये पौधें वानस्पतिक विधिओं द्वारा तैयार किया जाये | वानस्पतिक विधिओं में भेंट कलम, विनियर कलम बंधन, कोमल शाख कलम बंधन, स्टुली एवं गुट विधि प्रमुख है, गुटी विधि काफी आसान है |

गुटी तैयार करने के लिए पेन्सिल मोटाई की शाखा ( लगभग एक वर्ष पुराणी शाखा ) का चुनाव करना चाहिए, शाखा के चुनाव के पश्चात् छल्ले के आकार की 2.5-3 सेमी. लम्बाई की छाल निकल ली जाती है | छल्ले के उपरी सिरे पर सेराडेक्स पाउडर या इन्डोल ब्युटारिक एसिड (IBA) या इन्डोल असिटिक एसिड (IAA) का लेप लगाया जाता है | छल्ले को नम मास घास से ढककर ऊपर से लगभग 400 गेज पोलीथिन की 15-20 सेमी. की चौड़ी पट्टी से 2-3 बार लपेटकर सुतली से दोनों सिरों को कसकर बाँध दिया जाता है |

मास घास पानी को आसानी से अवशोषित कर लेती है, एक पेड़ से डेढ़ महीने बाद जब पोलीथिन से जड़े दिखाई देने लग जाती है, तब इस शाखा को पौधे से काटकर अलग कर लेना चाहिए | गुटी तेज धार वाले चाकू या सिकेटियर की मदद से छल्ले के करीब 2-3 निचे से काटकर अलग कर लेते है, इसके बाद इसे पोलीथिन की थैली, जिसमे 1:2:1 अनुपात में रेत, मृदा तथा खाद का मिश्रण हो, लगा देते है |

इस कार्य के लिए बरसात वाला मौसम (जुलाई-अगस्त) सही रहता है, कुछ क्षेत्रों में यह कार्य फ़रवरी में भी किया जाता है|

अमरुद की खेती के लिए गड्ढो की खुदाई

जिस बाग़ में रोपण का कार्य करना है सर्वप्रथम उस बाग़ में से सभी छोटे झाड़ीदार पौधे को निकल दे एवं खेत को अच्छी तरह तैयार करके समतल कर ले | उसके बाद सही विधि से बाग़ में गड्ढे खोदने के लिए रेखंकन कर ले, सही विधि के चयन से पौधों के देखभाल में कम खर्च के साथ ही बाग़ में मौजूद संसाधनों का भी ठीक तरह से सदुपयोग किया जा सकता है |

बगीचा लगाने के लिए वर्गाकार विधि सबसे आसान एवं सुगंम है, इससे सभी प्रकार के कृषि कार्य आसानी से किये जा सकते है| रेखांकन करने के पश्चात् खुंटी वाले स्थानों पर गड्ढो की खुदाई का कार्य करे, अमरुद के लिए गड्ढो का आकार 0.75×0.75×0.75 मीटर रखें एवं दो गड्ढो के बिच की दुरी 6×6 मीटर रखें कतार से कतार एवं पौधों से पौधों की दुरी, किस्म अथवा पौधे लगाने की प्रणाली पर निर्भर करती है|

गड्ढे खोदते समय उपर की आधी मिटटी एक तरफ व शेष आधी मिटटी को दूसरी तरफ दाल दे, खुदाई के बाद गड्ढों को 20-25 दिनों तक तेज धुप में खुला छोड़ दे, जिससे इसमें उपस्थित कीड़े मर जाये गड्ढा खोदते समय ऊपर की जो आधी मिटटी निकाली गयी थी, उसमे 20-25 किलोग्राम अच्छी तरह सड़ी गली गोबर की खाद, 1-1.5 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 500 ग्राम नील खली के साथ साथ 50 ग्राम क्यूनालफास 1.5 % चूर्ण अच्छी तरह से मिलाकर भर दें |

गड्ढो को भूमि की सतह से 10-15 सेमी. ऊपर तक भर दें एवं कुछ समय तक उनको व्यवस्थित होने के लिए छोड़ दे, 2-3 बारिश के पश्चात् जब मृदा निचे बैठ जाये उसके बाद पौध रोपण का कार्य प्रारंभ करें |

अमरुद की अच्छी खेती के लिए रोपण का समय एवं तरीका

पौधे लगाने के लिए बरसात वाला समय (जुलाई-अगस्त) सही रहता है, परन्तु सही सिंचाई की अच्छी सुविधा उपलब्ध हो वहां यह कार्य फ़रवरी मार्च में भी किया जा सकता है | रोपण से पूर्व यह ध्यान रखें की पौधा रेखांकन वाले स्थान पर ही लगे, इसके लिए भरे गड्ढों के बीच में खुंटी लगा देनी चाहिए, जिससे निशानदेही बनी रहती है | यदि पौधरोपण का कार्य परम्परागत तरीके से हो, जिसमे कतार एवं पौधे से पौधों की दुरी 6×6 मीटर रखी जाती है तो 277 पौधे प्रति हेक्टेयर लगाये जा सकते है |

केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ द्वारा किये गये अध्ययनों से पता चलता है की यदि अमरुद में रोपण का कार्य सघन बागवानी प्रणाली से किया जाए, जिसके तहत दुरी 3×3 मीटर (1111 पौधे/हेक्टेयर ) राखी जाये तो अधिकतम उत्पादन लिया जा सकता है | इसके अलावा अति सघन बागवानी (मीडो आर्चडिंग) के अंतर्गत 1.0×2.0 मीटर की दुरी पर प्रति हेक्टेयर 5000 पौधे लगाये जा सकते है |

इसमें उच्च उत्पादकता के साथ गुणवत्तायुक्त उत्पादन लिया जा सकता है, इन बगीचों में देख रेख की अधिक आवश्यकता पड़ती है इसके साथ साथ समय समय पर काट-छांट भी करनी पड़ती है अमरुद की इलाहाबाद सफेदा तथा ललित किस्म सघन बागवानी के लिए अधिक उपयुक्त है |

अमरुद का सुन्दर चित्र
अमरुद की अच्छी फसल

खाद एवं उर्वरक की मात्रा अमरुद की खेती के लिए

(किलोग्राम प्रति पौधों की दर से)

पौधे की आयु( वर्ष में)गोबर की खाद यूरिया सुपर फास्फेट म्यूरेट ऑफ़ पोटाश
1-310-150.05-0.250.15-1.500.20-0.40
4-620-250.30-0.600.50-2.000.40-0.80
7-1030-350.75-1.002.000.80-1.20
10 से अधिक501.002.501.20
खाद की मात्रा

खाद एवं उर्वरक की मात्रा, मृदा की उर्वरता, फसल को दी गयी कार्बनिक खाद की मात्रा इत्यादि पौधों की उम्र और किस्म पर निर्भर करती है | पौधों को यदि संतुलीत मात्रा में खाद एवं उर्वरक दिया जाये तो निश्चित रूप से पौधों की अच्छी बढ़वार एवं उत्पादन के साथ साथ अच्छी गुणवत्ता वाले फल भी प्राप्त किये जा सकते है अतः जहाँ तक संभव हो सके मृदा जांच के उपरांत ही खाद एवं उर्वरको का प्रयोग करें |

खाद एवं उर्वरको को देने का सही समय बहार पर निर्भर करती है, उर्वरको का प्रयोग फुल आने से एक माह पूर्व कर लेना चाहिए, शरद ऋतू की फसल के लिए देशी खाद, सुपर फास्फेट, पोटाश व यूरिया की आधी मात्रा जून तथा शेष यूरिया की मात्रा सितम्बर माह में देनी चाहिए | जबकि वर्षा ऋतू वाले फसल के लिए देसी खाद, सुपर फास्फेट, म्यूरेट ऑफ़ पोटाश की पूरी मात्रा तथा यूरिया की आधी मात्रा दिसंबर में और बची हुई यूरिया की आधी मात्रा मार्च अप्रैल में देनी चाहिए |

खाद एवं उर्वरक हमेशा मुख्य तने से 2-3 फुट की दुरी पर छतरी के निचे डाले अमरुद में सूक्ष्म पोषक तत्वों का भी बहुत महत्व है, इस लिए मृदा परिक्षण के अनुसार संतुत दर से जिंक सल्फेट, मैग्नीशियम सल्फेट, मैंगनीज सल्फेट प्रत्येक 0.5 % के घोल का छिड़काव पौधे पर नयी बढ़वार के समय प्रयोग करना वृद्धि तथा उत्पादकता बढ़ाने में सहायक है |

अमरुद की खेती में सिंचाई

पौधों में सिंचाई का सही समय कई कारकों जैसे मृदा के प्रकार, मृदा में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा मौसम इत्यादि पर निर्भर करता है | पौध रोपण के तुरंत पश्चात यदि वर्षा नही होती है तो सिंचाई अवश्य करें | गर्मियों में प्राय: 7-10 दिनों एवं सर्दियों में 15-20 दिनों के अन्तराल पर सिंचाई करें | वर्षा ऋतू की फसल लेने के लिए सिंचाई फरवरी-मार्च में शुरू करनी चाहिए | शरद ऋतू की फसल के लिए सिंचाई जून में प्रारम्भ कर देने चाहिए | फल विकास के समय उचित नमी होना आवश्यक होता है | बूंद-बूंद सिंचाई प्रणाली अमरुद की खेती के लिए अच्छी रहती है | इससे पानी की बचत के साथ-साथ उत्पादन एवं गुणवत्ता में भी सुधार होता है |

अंतरासस्यन

पौधों के रोपण के 2-3 वर्षों तक बगीचे से किसी प्रकार की आमदनी नही मिलती है | आरम्भ के वर्षों में आय का साधन बना राहे, इसके लिए पौधों अथवा कतारों के बीच खाली पड़ी जगह में दलहनी फलें जैसे मटर, ग्वार मुंग इत्यादि उगा सकते हैं | साथ ही सब्जियों में कददूवर्गीय फसलें उगा सकते हैं |

पलवार

amarud का पेड़
पलवार

बगीचों में अक्सर यह समस्यां देखने में आती है कि साफ-सफाई की आभाव में कई प्रकार के कीटों व रोगों का आक्रमण बढ़ जाता है | साथ ही खरपतवार पौधों के पोषक तत्व चुराने के साथ ही नमी की मात्रा को भी कम कर देते हैं | पलवार का प्रयोग करके इन समस्यायों से बचा जा सकता है | पलवार नमी संरक्षण के साथ-साथ मृदा के कटाव को कम करने, खरपतवारों के बीचों को उगने से रोकने एवं मृदा की तापमान को स्थिर रखने का कार्य भी करती है | पलवार के लिए सखी घास-फूस का उपयोग किया जा सकता है | परन्तु आजकल प्लास्टिक मल्चका प्रयोग अधिक किया जा रहा है | यह मृदा की भौतिक संरचना में सुधार के साथ-साथ फलों के उपज एवं गुणवत्ता में सुधार का कार्य भी करती है |

छत्रक प्रबंधन

रोपण की प्रारम्भिक अवस्था में कटाई-छंटाई का मुख्य उद्देश्य पौधों को एक निश्चित आकार एवं मजबूत ढांचा प्रदान करना होता है | इसके साथ ही भूमि के पास से निकलने वाले प्ररोहों अथवा जुडाव से निचे जो भी फुटान निकलता है, उसको भी समय पर निकलते रहना चाहिए | प्रारम्भ में यह देखना आवश्यक है कि मुख्य तने के तल से लगभग 70-80 सेमी. तक कोई शाखा ना हो | उसके पश्चात पौधे को इस ऊचाई से काट देने चाहिए |

 कटान के बाद पौधे से बहुत सी शाखाएं निकलती हैं परन्तु उनमे से अलग-अलग दिशाओं में जा रही 3-4 शाखाएं चुन ली जाती हैं | इनको 3-4 महीने बाद कुल लम्बाई की 50 प्रतिशत पुन: काट दी जाती है | यह कार्य एक प्रक्रिया के तहत चलता है | इससे पौधे का एक ढांचा विकसित हो जाता है, जिसके सम्पूर्ण भाग में प्रकाश पहुँच सकें साथ ही बाग़ के सम-सामयिकी कार्य में भी आसानी रहे | ढांचा विकसित होने के पश्चात काट-छाँट करते रहना चाहिए |

अमरुद में फुल एवं फल नये फुटान पर ही आता है | अत: जितने अधिक कल्लों का सृजन होगा पैदावार में भी उतना ही इजाफा होगा | यह गुणवत्तायुक्त फल प्राप्त करने के लिए भी आवश्यक है और यह काट-छांट की समय ली जानी वाली बहार पर निर्भर करता है | यह कार्य जनवरी के अंतिम सप्ताह से फरवरी मध्य, मई-जून एवं अक्टूबर में कर सकते है |

मृग बहार लेने के लिए जनवरी के अंतिम सप्ताह से फरवरी मध्य, हस्त बहार के लिए मई-जून एवं अम्बे बहार के लिए अक्टूबर का काट-छांट का कार्य करते हैं | काट-छांट वाले स्थानों पर बोर्डो पेस्ट अथवा कॉपर आंक्सीक्लोराइड का लेप अवश्य लगा देना चाहिए |

फल एवं फुल आने का समय

अमरुद के पौधे वर्ष में तीन बार फुल आते है इसे बहार के नाम से जाना जाता है अमरुद में पुष्पन काल 25-45 दिनों का होता है, जोकि उगाई जाने वाली किस्म, जलवायु, मृदा की दशा इत्यादि पर निर्भर करता है यदि एक ही पौधे से तीनो बहार ली जाती है तो कम उत्पादन के साथ साथ फलों की गुणवत्ता में भी कमी आती है अतः जहाँ तक संभव हो एक पौधे से केवल एक ही बहार लेनी चाहिए, शेष दो बहारो के फूलो को झाड़ लेना चाहिए, जिसे बहार नियंत्रण के नाम से जाना जाता है |

फलों के सबसे अधिक उपज बरसात वाली फसल में मिलती है, इस फसल में फल मक्खी, फ़फुन्दि जनित रोगों, जैसे एन्थ्रेक्नोज के कारण काफी नुकसान हो जाता है | साथ ही फलों की गुणवत्ता अच्छी न होने के कारण किसान भाइयो को आर्थिक लाभ कम मिल पाता है इसलिए इस बहार को नहीं लेना चाहिये |

बहार लेने का समय सिंचाई की सुविधा, बाजार मूल्य अथवा मांग एवं फल की गुणवत्ता पर निर्भर करता है, मृग बहार सबसे उत्तम मानी जाती है | इसके फल सर्दिओं में पकते है, जिनके किट व रोगों का आक्रमण बहुत कम होता है इससे फलों की गुणवत्ता अच्छी रहती है | इस बीच आये फलों का स्वाद भी अच्छा होता है, जिसके कारण बाजार भाव उचित मिल जाता है |

अदरक की खेती उन्नत किस्मे

अमरुद इलाहबाद सफेदा amrud
अमरुद की किस्म

अमरुद में कई उन्नतशील किस्में विकसित की गयी है, किस्म का चयन बहुत ही सावधानीपूर्वक करना चाहिए क्योंकि किस्मों का प्रदर्शन स्थानीय दशाओं जैसे जलवायु, मृदा, पानी की गुणवत्ता, प्रबंधन आदि पर निर्भर करता है | पौधे हमेशा किसी विश्वस्त स्त्रोत अथवा सरकारी नर्सरी से ख़रीदे एवं खरीदते समय यह सुनिश्चित कर ले की पौधा स्वस्थ एवं रोगमुक्त हो |

साथ ही पौधों का जुड़ाव सही हो एवं उसकी उम्र भी अधिक न हो कुछ किस्मो के नाम एवं उसकी खासियत निम्नलिखित है-

किस्मेखासियत
इलाहाबाद सफेदा इस किस्म के पौधे लम्बे एवं सीधे बढ़ने वाले होते है फल गोल, चमकदार सतह, सफ़ेद गुदे वाले तथा मीठे होते है|
लखनऊ-49 (सरदार)इसके पौधे छोटे, अधिक शाखायुक्त, फैलावदार तथा अधिक फलन वाले होते है | फल बड़े आकार के खुरदुरी सतह वाले, सफ़ेद गुदे तथा स्वाद में उत्तम होते है |
ललितयह ‘एप्पल कलर’ से चयनित उन्नत किस्म है फल ताज़ा खाने एवं प्रसंस्करण के लिए उपयुक्त होते है, यह अधिक पैदावार वाली किस्म है गुदा कड़ा एवं लाल रंग का होता है |
श्वेता यह भी एक अधिक उत्पादन वाली किस्म है इसका पौधा मध्यम आकार का होता है | फल गोल, मुलायम, कम बीज वाले, श्वेत आभायुक्त पीले रंग के होते है जिन पर कभी कभी लालिमा भी उभर आती है|
अर्का मृदुला भारतीय बागवानी अनुसन्धान संसथान बेंगलूर द्वारा विकसित इस किस्म का चयन इलाहाबाद सफेदा किस्म द्वारा किया गया, इसके पौधे मध्यम आकार के फैलने वाले होते है यह जैली बनाने के लिए अच्छी किस्म है|
अर्का अमूल्यायह प्रजाति इलाहाबाद सफेदा और सीडलेस का संकर किस्म है पौधे मध्यम आकार के फैलने वाले होते है, यह गोलाकार मुलायम कम बीज वाले सफ़ेद गुदायुक्त होते है |
अर्का किरण यह भी संकर किस्म है जोकि कामसरी एवं बैगनी लोकल किस्म से विकसित किया गया है, गुदा कठोर एवं गहरे गुलाबी रंग का होता है |
इलाहाबाद सुर्खाइसके पौधे तेजी से बढ़ने वाले अर्धवृत्ताकार तथा घने होते है फल बड़े तथा छिलका एवं गुदा दोनों लाल रंग का होता है, इसके फल कम बीज वाले, मीठे तथा सुवासयुक्त होते है |
हिसार सफेदा यह किस्म इलाहाबाद सफेदा व सिड्लैस अमरुद के द्वारा तैयार की गयी है, पौधे सीधे तथा अधिक बढ़वार वाले, फल गोल व चमकदार, गुदा सफ़ेद तथा कम बीज वाले अधिक मिठास तथा स्वाद वाले होते है|
हिसार सुर्खायह किस्म एप्पल कलर अमरुद व बनारसी सुर्खा के संकरण द्वारा तैयार की गयी है पौधे लम्बे तथा फैलाव वाले होते है | फल गोल तथा छिलका हल्का पीले रंग का, गुदा गुलाबी तथा अधिक मिठास वाली होती है
अमरुद की किस्मे

तुड़ाई एवं उपज

सामान्यतः अमरुद में फुल आने से फल बनने में 4.5 से 5 महीने तक का समय लग जाता है | फल जब परिपक्व होने लगते है, इनका रंग हरे से पिला होने लगता है | फलों की रंग परिवर्तन की अवस्था में उन्हें सावधानीपूर्वक तोड़ लेना चाहिये, अधपके फल स्वाद एवं खाने में भी अच्छे होते है अतः समय पर तुड़ाई कर लेनी चाहिये, फलों की उपज किस्म, प्रबंधन, बहार इत्यादि कारणों पर निर्भर करती है | सामान्यतः एक पूर्ण विकसित पौधों से लगभग 70 से 100 किलोग्राम तक फल प्राप्त किये जा सकते है |

अमरुद के पौधों में रोग एवं रोकथाम

अमरुद में कई तरह के किट एवं रोगों का आक्रमण होता है, जिसके कारण फसल को बहुत नुकसान हो जाता है | जरुरी है की सही समय पर इनकी पहचान करके इनका नियत्रण किया जाये कुछ महत्वपूर्ण किट एवं रोगों का विवरण उनके प्रबंधन के तरीके निम्नलिखित है –

अमरुद का उत्पान, अमरुद की खेती
अमरुद की खेती

फल मक्खी

यह कीट अमरुद की फसल को सबसे ज्यदा नुकसान पहुंचता है | खासकर बरसातकालीन फसल पर इसका प्रकोप सर्वाधिक होता है | यह मक्खी पीले रंग की होती है, जोकि घरेलू मक्खी से आकार में थोड़ी बड़ी होती है | इसे डॉकस डार्सोलिस के नाम से जाना जाता है | यह मक्खी फलों के अंदर समूह में अंडे देती है | ये अंडे सफेद रंग के छोटे-छोटे चांवल के आकार के होते हैं | अंडरोपण के २-३ दिनों बाद अंडों से पैरविहीन सफेद लटे (मैगटस) निकलती हैं ये जो फल के अंदर के गुदे को खाने लगती हैं | इसके परिणामस्वरूप फलों में सड़न पैदा हो जाती है | ये कमजोर होकर निचे गिरने लग जाते हैं | नवम्बर से मार्च तक यह कीट प्रौढ़ावस्था में शीतनिष्क्रिय रहता है | 

नियंत्रण

  • बाग़ की गर्मियों में गहरी जुताई कर दें | ताकि मृदा में उपस्थित मक्खी के प्यूपा सतह पर आकर गर्मी के कारण नष्ट हो जाएँ या चिड़ियों के द्वारा खा लिए जाएँ |
  • प्रभावित फलों को इकट्ठा करके भूमि में गहरा दबा देना चाहिए अथवा जला कर नष्ट क्र दें, ताकि इनका जीवन चक्र समाप्त हो जाये | बरसातकालीन फसल में इसका प्रयोग अधिक होता है | इस बहार को नियंत्रित कर दे एवं एवं सर्दियों वाली फसल ही लें |
  • फल मक्खी को अमोनिया से बनी ल्युर व आइसो युजिनोल नामक रसायन आकर्षित करता है | इन्हें कीटनाशी के साथ मिलाकर कीटों को नष्ट किया जा सकता है |
  • फल मक्खी ट्रैप से विशेष प्रकार की गंध आती है | यह मक्खी को अपनी ओर आकर्षित करती है | एक बोतल में 200 मि. ली. पानी में मिथाइल युजोनिल 0.1 प्रतिशत + मेलाथियान 0.1 प्रतिशत को घोलकर पौधे पर 5-6 फीट ऊचाई पर लटका दें | ट्रैप के मिश्रण को प्रति सप्ताह बदल दें | इसको काली से फल बनने की समय पर ही बगीचों में उचित दुरी पर लगा देना चाहिए | एक हैक्टर क्षेत्र में 10 ट्रैप पर्याप्त होते हैं |
  • कर्बिरिल 0.2 प्रतिशत या शेविन या मिथाइल डिमीटान 25 ई.सी. 1 मि.ली. प्रति लीटरपानी की दर से छिड़काव करें |
  • 500 मि.ली. मैलाथियान (सायथियान) 50 ई.सी. + 5 कि.ग्रा. गुड़ या चीनी को 500 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें | अगर प्रकोप बना रहता है तो छिड़काव 7 से 10 दिनों के अंतर में दोहरायें |

छाल भक्षक कीट

इस कीट का प्रयोग ऐसे बाग़-बगीचों में अधिक होता है, जहाँ सही तरीके से देखभाल नहीं होती है | इस कीट की लटें (इल्लियाँ) छाल, शाखाओं या तनों में छेंद करके अन्दर छिपी रहती हैं | ये रात्रि में छिद्रों से बाहर आकर छाल को खाकर नुकसान पहुंचती हैं |

नियंत्रण

  • बाग़ को हमेशा साफ-सुथरा रखें | कटी-फटी एवं सूखी छाल एवं ग्रसित शाखाओं को काट कर जला दें
  • कीट द्वारा बनाये गए सुराखों को साफ करके उनमें कैरोसिन या पेट्रोल या क्लोरोफार्म 3-5 मि.ली. प्रति सुरंग या छिद्र में पिचकारी या इंजेक्शन की सहायता से डाले व उनको कालीमृदा या रुई के फाहों से बंद कर दें |
  • अधिक आक्रमण होने की दशा में पौधों के तनों पर कॉपर आक्सीक्लोराइड (सी.ओ.सी.) के घोल का लेप कर दें | साथ ही कार्बेरिल 50 WP को 20 ग्राम प्रति लीटर की दर से तने की तीन फीट की ऊँचाई तक छिड़काव करें |

म्लानि या उकठा (मुरझान सुखा या विल्ट)

अमरुद का यह एक बहुत हानिकारक रोग है, इसके कारण इसका उत्पादन बहुत प्रभावित होता है | उत्तरी भारत के कुछ क्षेत्रों में तो इसके कारण बड़े-बड़े बगीचे नष्ट हो चुके है इसमें जडो के रोगग्रस्त होने के काफी समय बाद लक्षण दिखाई देते है | रोगग्रस्त पौधों के पत्तियां बहुत कम हो जाती है, कई शाखाएं तो पर्ण विहीन हो जाती है | पहले पत्तियां पीली पड़ती है और बाद में पौधा सूखने लगता है |

रोकथाम

  • पौध उन्ही बागों में लगाये जहाँ पानी के निकास की अच्छी व्यवस्था हो, बहुत अधिक भरी मृदा में पौधें न लगायें| वर्षा या सिंचाई में पानी को तने के चारो ओर खड़ा न होने दे |
  • क्षारीय मृदा में इसका प्रकोप अधिक होता है, रोपण से पूर्व मृदा की जांच अवश्य करवा ले | उसी के अनुरूप फसल अथवा किस्म का चयन करें, जहाँ इस रोग की समस्या हो वहां पर सरदार (लखनऊ-49) किस्म लगायें इस किस्म में यह रोग कम मिलता है |
  • रोगग्रसित पौधों की मृदा को बाविस्टीन 1 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर अच्छी तरह भिगो दे|
  • ग्रसित पौधे को जद सहित उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए, उस स्थान पर नया पौधा लगाने के पूर्व मृदा का उपचार बाविस्टिन के घोल से करें|

श्यामव्रण, फल गलन या टहनी मार रोग

फलों में संक्रमण होने के फलस्वरूप बनते हुए फल छोटे, कड़े व काले रंग के होते है या कई बार यह लक्षण काफी देर से उत्पन्न होते है | फल पकने वाली अवस्था में फलों के ऊपर गोलाकार एक या अनेक धब्बे और बाद में बीच में धंसे हुए स्थान तथा नारंगी रंग के फफूंद उत्पन्न हो जाते है | डालियो में यदि संक्रमण हो जाये तो डालियाँ या शाखाये पीछे से सूखने लगती है |

रोकथाम

 रोगग्रस्त डालियो को काटकर 0.3% कॉपरऑक्सीक्लोराइड के घोल का छिड़काव करें, फल लगने के 15 दिनों की अवधी पर 2-3 छिड़काव करें |

अमरुद ली खेती का विडियो


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