एलोवेरा की खेती कैसे करे

एलोवेरा की खेती, घृतकुमारी की खेती कैसे करें 2021

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एलोवेरा की खेती- परिचय (Introduction)

घृतकुमारी जिसे ग्वारपाठा या अंग्रेजी भाषा में एलोवेरा कहते हैं, एक औषधीय पौधा है | यह साल भर हरा-भरा रहने वाला पौधा है | घृतकुमारी की उत्पत्ति दक्षिणी यूरोप एशिया या अफ्रीका के सूखे क्षेत्रों में मानी जाती है | भारत में घृतकुमारी का व्यवसायिक उत्पादन सौन्दर्य प्रसाधन के साथ दवा निर्माण के लिए किया जाता है | घृतकुमारी की पत्ती ही व्यासायिक इस्तेमाल में आती है | वर्तमान समय में इसका इस्तेमाल औषधीय निर्माण, सौन्दर्य प्रसाधन, सब्जी और आचार के लिए किया जाता है |

एलोवेरा की खेती करने के लिए जलवायु

एलोवेरा की व्यावसायिक खेती शुष्क क्षेत्रों से लेकर सिंचित मैदानी क्षेत्रों में की जा सकती है | परन्तु यह आज देश के सभी भागों में उगाया जा रहा है | राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में इसका व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन किया जा रहा है | इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे बहुत ही कम पानी तथा अर्द्ध शुष्क क्षेत्र में भी आसानी से उगाया जा सकता है | घृतकुमारी फसल के विकास के लिए सबसे उपयुक्त तापमान 20-22 डिग्री सेल्शियस होता है परन्तु यह पौधा किसी भी तापमान पर अपने को बचाये रख सकता है |

एलोवेरा की खेती के लिए मिट्टी

घृतकुमारी फसल बलुई मिट्टी, बलुई दोमट तथा पहाड़ी मिट्टी से लेकर किसी भी प्रकार की मिट्टी सफलतापूर्वक उगायी जा सकती है | यह पाया गया है कि हल्की काली उपजाऊ मिट्टी में इसका विकास अधिक होता है | अत: इसका व्यावसायिक उत्पादन काली मिट्टी वाली क्षेत्र में ज्यादा हो रहा है | अच्छी जल निकास वाली बलुई मिट्टी जिसका पी.एच.मान 8.5 तक हो इसके लिए उपयुक्त पायी गई है |

घृतकुमारी के लिए खेत की तैयारी

एलोवेरा के पौधे 20-30 से.मी. की गहराई तक ही अपनी जड़ों का विकास करते हैं | अत: खेत की सतही जुताई ही फायदेमंद है | जलवायु और मिट्टी की दशा को ध्यान में रखते हुए एक से दो जुताई करके पाटा चला देना चाहिए | खेतो को 15 मी. X 3 मी. की आकार में बाँट कर अलग-अलग क्यारी बनाना चाहिए ताकि जल उपलब्धता के आधार पर इसकी सिंचाई की जा सकें |

रोपाई का समय

इसकी रोपाई का सबसे उपयुक्त समय जुलाई-अगस्त है | इस मौसम में रोपाई करने से पौधे पूरी तरह जीवित रहते हैं और उनका विकास तेजी से होता है | सिंचाई की सुविधा वाले क्षेत्रों में हम सालों भर इसकी रोपाई कर सकते है | इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अगर जाड़े में कड़ाके की ठंड पड़ रही हो तब इसकी रोपाई नहीं करनी चाहिए |

एलोवेरा की खेती का पौधा
एलोवेरा की खेती का पौधा

Aloevera की किस्में

भारत में aloevera की बहुत सारी किस्में विकसित नहीं हुई है फिर भी आई.सी.—111271, आई.सी.—111280, आई.सी.—111269 और आई.सी.—111273 का व्यावसायिक तौर पर उत्पादित किया जा सकता है | इन किस्मों में पाई जानी वाली एलोडिन की मात्रा 20 से 30 प्रतिशत तक होती है |

अच्छी एलोवेरा पौध की चयन कैसे करें

व्यावसायिक उत्पादन के लिए घृतकुमारी की 4-5 पत्ती वाली लगभग चार महीने पुरानी, 20-25 से.मी. लम्बाई के पौधे (सकरर्स) का चयन करते हैं | घृतकुमारी के पौधे की यह खासियत होती है कि इसे उखाड़ने के महीनों बाद भी लगाया जा सकता है |

एलोवेरा की खेती के लिए इसको लगाने की दूरी

घृतकुमारी के पौधे को हम 60 X 60 से.मी. (दो फीट) की दूरी पर लगाना चाहिए | मतलब लाइन से लाइन की दूरी 60 से,मी, और पौधों से पौधों की दूरी 60 से,मी. रखते हैं | पौधे के दूरी किस्मों के अनुसार कम ज्यादा हो सकती है | एलोवेरा का पौधा लगाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पौधे को लगाने के बाद मिट्टी को अच्छी तरह दबा दें | एक एकड़ में औसतन 11000 पौधे लगते हैं |

खाद और उर्वरक एलोवेरा की खेती के लिए

साधारणतया घृतकुमारी को कम उपजाऊ जमीनों में लगाते हैं और कम खाद और उर्वरक भी इससे अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते है | लेकिन अच्छी उपज के लिए खेत को तैयार करते समय 10-15 तन सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए इसके उत्पादन में गुणात्मक रूप से वृद्धि होती है | गोबर की खाद का इस्तेमाल करने से पौधे की बढ़वार तेजी से होती है और किसान एक वर्ष में एक से अधिक कटाई कर सकता है |

एलोवेरा में सिंचाई

घृतकुमारी शुष्क क्षेत्र के लिए उपयुक्त फसल मानी जाती है और यह पानी की कमी को आसानी से बर्दाश्त कर लेती है | लेकिन अधिक उत्पादन के लिए उसकी क्रांतिक अवस्था में सिंचाई करना काफी लाभप्रद होता है | पहली सिंचाई पौध लगाने के बाद तथा दूसरी और तीसरी सिंचाई आवश्यकतानुसार करनी चाहिए | वर्ष में 2-3 जीवन रक्षक सिंचाई करने से भी अच्छी पैदावार हो सकती है | प्रत्येक कटाई के बाद एक सिंचाई देना लाभदायक होता है |

aloevera ki kheti video

एलोवेरा की खेती में खरपतवार नियंत्रण

फसल को खरपतवार से मुक्त रखना चाहिए | प्राय: कम उपजाऊ जमीन में खरपतवार का प्रकोप काफी कम होता है फिर भी खेत में यदि खरपतवार की समस्या हो तो उसे भौतिक / यांत्रिक विधि से नष्ट कर देना चाहिए | खरपतवार निकालते वक्त घृतकुमारी के सूखे पत्तो और रोगग्रसित पौधों को भी निकालते रहना चाहिए |

एलोवेरा में कीड़ा—बीमारी

घृतकुमारी में कीड़ा-बीमारी का प्रकोप नहीं के बराबर होता है | पहाड़ी क्षेत्रों में दीमक का प्रकोप हो सकता है जिसका नियंत्रण क्लोरोपाईरिफॉस की 5 मि.ली. दवा प्रति लीटर पानी में मिलाकर व्यवहार करके किया जा सकता है |

एलोवेरा की खेती में कटाई और उपज

घृतकुमारी की पत्ती जब पूरी तरह विकसित हो जाये, तब उसकी तुड़ाई करनी चाहिए | परन्तु पत्तियों को तोड़ते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि पौधे के बीज की कम से कम नवीनतम पत्तियाँ पौधे में लगे हो, अन्यथा पौधे का विकास रुक जायेगा | औसतन प्रति हेक्टेयर 15-20 टन ताज़ी पत्तियों उत्पादन होता है | अच्छी देखभाल वाली फसल से 25-35 टन प्रति हेक्टेयर तक ताज़ी पत्ती प्राप्त की जा सकती है |

घृतकुमारी (एलोवेरा) में बाजार की व्यवस्था

आज भारत के साथ-साथ विदेशों में भी एलोवेरा के पत्तों की मांग बहुतायत में हैं | अनेक कम्पनियां और संस्थायें किसानों के साथ मिलकर घृतकुमारी के पत्तों की खरीदी कर रही है | घृतकुमारी के विपणन में कृषि विज्ञान केंद्र किसानों की मदद कर सकता है |


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