आम की खेती

Aam ki kheti hindi | आम की खेती | कैसे करे ? | ( benefits of mango cultivation ) 2020-21

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Table of Contents

परिचय

आम की खेती प्राचीन से ही होती आ रही है आदि काल से ही भारत में आम (मैन्जिफेरा इंडिका एल.) जन सामान्य द्वारा सर्वाधिक पसंद किया जाने वाला फल है | इसे अपनी पौष्टिकता, मधुर स्वाद, उत्तम सुवास, विभिन्न किस्मो एवं अच्छे रंग-रूप के फलस्वरूप ही सर्वोत्तम फल माना गया है और भारत में इसे  फलों का राजा की संज्ञा दी गयी है |

भारत वर्ष में आम की खेती 1486.9 हजार हेक्टेयर भूमि पर की जाती है जिससे लगभग 10503.5 हजार मे. टन आम का उत्पादन होता है | फलों के अंतर्गत कुल क्षेत्रफल (37.97 लाख हेक्टेयर) में आम का हिस्सा 39.16 % है तथा सकल उत्पादन (4.55 करोड़ टन) में इसका योगदान 23.09 % है |

क्षेत्रफल का उत्पादन की दृष्टि से उत्तर प्रदेश, आंध्रप्रदेश के पश्चात् द्वितीय स्थान पर है | आंध्रप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार एवं कर्नाटक आम उत्पादन करने वाले अग्रणी राज्य है, जहाँ इसका उत्पादन क्रमशः 2379.6, 1519.0, 1871.9, तथा 1179.9 हजार मे. टन है| आम उत्पादन में विश्व में भारत का प्रथम स्थान है( Rank first in mango production ) | विश्व में कुल आम उत्पादन (1800-2000 टन) में भारत का योगदान लगभग 36.64% है|

आम के पेड़ का प्रत्येक भाग किसी न किसी रूप में उपयोग में लाया जाता है, जहाँ आम की टहनियां हवन में प्रयुक्त होती है, वहीँ पत्तियां मंगल कलश पर, मंगल बंधनवार तथा अनेको धार्मिक कार्यो में प्रयुक्त होती है |

 लकड़ी जहाँ इमारती कार्यों में प्रयुक्त होती है वहीँ फल खाने में प्रयोग किये जाते है | कच्चे आम, चटनी, आचार, अमचुर तथा पेय पदार्थ बनाने में उपयोग में लाये जाते है |

पके फल खाने के अतिरिक्त गुदा, रस, स्क्वेश, जैम, फांक, नेक्टर, एवं आम पापड़ में प्रयुक्त होते है | यहाँ तक की आम की गिरी भी सुखाकर खाने में प्रयोग की जाती है, इस गिरी में 8-10 % वसा होती है जिसका उपयोग साबुन तथा इससे प्राप्त स्टार्च का उपयोग बिस्कुट उद्योग मे लिया जाता है | आम के फलों में विटामिन ‘ए’ तथा ‘सी’ प्रचुर मात्रा में होते है

भारत में आम के फल एवं उत्पाद के निर्यात की प्रबल क्षमता है | यद्यपि आम की खेती से आम एवं उसके उत्पादों का निर्यात मुख्यतः खाड़ी देशो में किया जाता है, अमेरिका, यूरोपीय एवं एशियाई देशो में भी इनके निर्यात बढ़ाने में प्रयत्न किये जा रहे है| 2.63 हजार टन आम के फलों का हाल ही में निर्यात किया गया था |

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आम की खेती के लिए जलवायु

आम उष्ण तथा उपोष्ण दोनों ही प्रकार की जलवायु में पैदा किया जा सकता है | भारत में आम की खेती समुद्र तल से लेकर 1500 मीटर ऊँचाई तक वाले हिमालय क्षेत्र में की जा सकती है लेकिन व्यवसायिक दृष्टि से इसे 600 मीटर तक ही अधिक सफलता से उगाया जा सकता है | तापक्रम में उतार चढ़ाव, समुद्र तल से ऊँचाई, वर्षा एवं आंधी इसकी उपज पर प्रतिकूल प्रभाव डालते है | छोटे पौधों को पाले से अधिक हानि हो सकती है |

आम की अधिकतर किस्मे औसत वार्षिक वर्षा व शुष्क वातावरण वाले क्षेत्रों में अच्छी पनपती है, इसके लिए वर्षा का वार्षिक वितरण अधिक महत्वपूर्ण है | बौर आने के समय शुष्क मौसम अच्छा होता है, फल लगने के पश्चात् हलकी वर्षा उपयोगी होती है किन्तु अतिवृष्टि, तेज आंधी, ओले व चक्रवात से बौर व फल गिर जाते है जिससे अत्यधिक हानि होती है |

भूमि ( aam ki kheti ke liye )

आम का वृक्ष अनेक प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है | यह समुद्र तट से पहाड़ी क्षेत्रों में सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है, यही कारण है की आम के बाग़ कम व अधिक उपजाऊ दोनों ही प्रकार के भूमि में पाए जाते है |

 यद्यपि आम को लगभग हर प्रकार की भूमि में लगाना संभव है इसके बागों को लगाने के लिए निरी बलुई, ढालू, पथरीली, क्षारीय तथा जल भराव वाली भूमि में आम की खेती नही की जा सकती है |

आम की सफल खेती के लिए दोमट, उचित जल निकास वाली तथा गहरी भूमि, जिनका PH मान 5.5-7.5 के मध्य हो, उपयुक्त मानी गयी है | कम उपजाऊ वाले भूमि में आरम्भ से ही खाद एवं उर्वरक की उचित व्यवस्था करके ही आम का पौधा लगाना चाहिए, जिससे पौधों को स्थापित होने में सुविधा हो |

आम की खेती के लिए किस्मे

राज्यप्रमुख किस्मे
आंध्रप्रदेशबैंगनपल्ली, बंगलौरा, चेरुकुरासम, हिमायुद्दीन, सुवर्णरेखा, मलगोवा
बिहारलंगड़ा (मालदा), बम्बई, हिमसागर, किशन भोग, सुकुल, बथुवा, जरदालू, सीपिया, फजरी, गुलाब खास
गोवाफरनानडीन, मनकुराद
गुजरातकेसर, अल्फान्सो, राजापुरी, वनराज, जमादार
हरियाणासिरोली (बाम्बे ग्रीन), दशहरी, लंगड़ा
कर्नाटकअल्फान्सो, बंगलौरा, मलगोवा, नीलम, पैरी, रसपुरी
केरलमूनडप्पा, ओल्यूर, पैरी
मध्य प्रदेशअल्फान्सो, बम्बई, लंगड़ा, दशहरी, सुन्दरजा
महाराष्ट्रअल्फान्सो, केसर, मनकूराद, पैरी, मलगोवा
उड़ीसाबैंगनपल्ली, लंगड़ा, नीलम, सुवर्णरेखा
पंजाबदशहरी, लंगड़ा, समरबहिश्त, चौसा
तमिलनाडुबैंगनपल्ली, बंगलौरा, नीलम, रूमानी, मलगोवा
उत्तरप्रदेशदशहरी, बाम्बेग्रीन, गौरजीत, लंगड़ा, फजरी, सफ़ेद लखनऊ, समरबहिश्त, चौसा, गुलाबजामुन, खासुलखास, रतौल
पश्चिम बंगालबम्बई, हिमसागर, किशनभोग, लंगड़ा, जरदालू, रानीपसंद, फजरी, अश्वानिया, लखनभोग

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आम की खेती के लिए व्यावसायिक किस्मे

1.अल्फान्सो

महाराष्ट्र प्रान्त में पैदा की जाने वाली आम की खेती के लिए यह मुख्य व्यावसायिक किस्म है | देश में इसे सबसे अधिक पसंद किया जाता है, देश के विभिन्न भागो में इसे अलग अलग नामो से जाना जाता है जैसे :- बादामी, गुंडू, खादर, अप्पास हापूस तथा कागदी हापूस | इसके फलों का आकार मध्यम, तिरछा व अंडाकार तथा रंग पीला नारंगी होता है |

इसके फलों में सुवास व गुणवत्ता अति उत्तम तथा भण्डारण क्षमता अच्छी होती है | इस किस्मो के फल मध्य मौसम में तैयार होते है, अन्तराष्ट्रीय बाजार में इसकी अच्छी मांग है | भारत द्वारा मुख्य रूप से इस किस्म के ताजे फलों का निर्यात अन्य देशो में किया जाता है |

2.बंगलौरा

यह दक्षिण भारत की व्यावसायिक किस्म है, इसे बंगलौरा के अतिरिक्त अन्य कई नामो से भी जाना जाता है जैसे :- तोतापुरी, कल्लामाई, थिवेदियामुथी, कलेक्टर, बर्मोदिल्ला, किली मुक्कू तथा गीली मुक्कू | इसके फल का आकर साधारण लम्बा तथा आधार गले के आकार का होता है, इसका रंग सुनहरा पीला होता है लेकिन स्वाद बहुत अच्छा नही होता |

इस किस्म के फलों की सबसे अच्छी विशेषता इसकी भंडारण क्षमता है, इसे बहुत दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है | इस किस्म का प्रसंस्करण उद्योग में व्यापक उपयोग होता है, यह मध्य मौसम में तैयार होने वाली किस्म है, उत्तर भारत में भी इस आम की खेती को प्रोत्साहित किये जाने की अच्छी सम्भावना है |

3. बैंगनपल्ली

यह आंध्रप्रदेश व तमिलनाडु की व्यावसायिक किस्म है, इसे चपटा, सफेदा, बेनेशान और चपटाई नामो से भी जाना जाता है | इसका फल आकार में लम्बा एवं तिरछा अंडाकार होता है, फल का रंग सुनहरा पीला होता है | यह मध्य मौसम में पकने वाली किस्म है जो डिब्बाबंदी के लिए उपयुक्त पायी जाती है, इसकी भण्डारण क्षमता अधिक है तथा स्वाद साधारण अच्छा है, हाल के वर्षो में आंध्रप्रदेश में इसे निर्यात किया जा रहा है |

3. बम्बई

यह बिहार प्रान्त की व्यावसायिक किस्म है | यह बंगाल में माल्दा के नाम से भी जाना जाता है | इसका फल मध्यम एवं वक्र अंडाकार और रंग पीला होता है, इसका स्वाद व भण्डारण क्षमता मध्यम है यह शीघ्र पकने वाली किस्म है |

4.बाम्बे ग्रीन

इस किस्म को उत्तर भारत ने अधिक लगाया जाता है, यह एक अगेती किस्म है तथा पश्चिम उत्तरप्रदेश में इसे सिरौली के नाम से भी जाना जाता है | इसका रंग पालक की तरह हरा एवं आकार अंडाकार व आयताकार होता है, इसका फल मध्यम आकार तथा अच्छे स्वाद वाला होता है, यह एक मध्यम भण्डारण क्षमता वाली किस्म है |

5.दशहरी

लखनऊ के पास दशहरी गाँव में इसकी उत्पत्ति के कारण इस किस्म को दशहरी के नाम से जाना जाता है | दशहरी, उत्तर भारत की प्रमुख आम की खेती का व्यावसायिक किस्म है तथा देश की सर्वोत्तम किस्मो में इसका प्रमुख स्थान है | इसका फल आकार में मध्यम, लम्बा एवं आयताकार होता है | इसके पके फलों का रंग पीला होता है जो मध्य मौसम में पकता है, इसके फलों की गुणवत्ता एवं भण्डारण क्षमता अच्छी है | मुख्यतः दशहरी आम के पके ताजे फल खाने में प्रयोग होते है |

6.दशहरी-51

यह दशहरी किस्म से चयनित नियमित फलन तथा अधिक उपज देने वाला क्लोन है | इसकी उत्पादकता दशहरी किस्म की अन्य क्लोन की अपेक्षा लगभग 38.8% अधिक है जिससे आम की खेती से आपको अधिक उत्पादन मिलता है

7. फजरी

आम की यह किस्म मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, तथा बंगाल में उगाई जाती है, इसका फल काफी बड़ा लम्बा, वक्र अंडाकार तथा रंग हल्का हर होता है | इसके फलों की गुणवत्ता व भण्डारण क्षमता मध्यम होती है | आम की यह किस्म देर से तैयार होती है |

8. फरनानडीन

यह मुंबई की बहुत पुराणी किस्म है, कुछ लोग इसकी उत्पत्ति स्थल गोवा मानते है | इसके फलों का आकर मध्य से लम्बा, अंडाकार या गोल अंडाकार एवं रंग पीला तथा उपरी भाग लाल होता है इसकी भण्डारण क्षमता व गुणवत्ता मध्यम होती है | यह देर से तैयार होने वाली किस्म है\ दशहरी की तरह ही इसके फलों को भी खाया जा सकता है |

9.हिमसागर

यह बंगाल की प्रसिद्द आम की किस्म है जिसे वहां बहुत पसंद किया जाता है | इसका फल मध्यम आकार, चपटा या अंडाकार तथा पीला होता है, इसके फलों की गुणवत्ता तथा भण्डारण क्षमता अधिक है | यह जल्दी पककर तैयार होने वाली किस्म है |

10. केसर

अपने उपरी भाग में तोते की चोंच सा लाल रंग लिए हुए आम की यह किस्म गुजरात प्रान्त की प्रमुख किस्म है | महाराष्ट्र में भी इसकी खेती बड़े पैमाने पर बढ़ रही है | इसका फल मध्यम तथा आकार लम्बा होता है, और इसे काफी दिनों तक भंडारित किया जा सकता है | यह शीघ्र पकने वाली किस्म है, गुजरत एवं महाराष्ट्र से इस किस्म के फलों का निर्यात किया जाता है |

11. किशन भोग

बंगाल के मुर्शिदाबाद में उगाई जाने वाली आम की इस किस्म के फल मध्यम आकार के, तिरछे गोलाकार तथा पीले रंग के होते है | फलों की गुणवत्ता अच्छी होती है तथा इसे काफी दिनों तक संरक्षित किया जा सकता है, इस किस्म के फल मध्य मौसम में पक कर तैयार होते है |

12.लंगड़ा

उत्तर भारत के बनारस, गोरखपुर तथा बिहार क्षेत्र में उगाई जाने वाली आम की इस किस्म के फल मध्यम, अंडाकार तथा हल्का हरे रंग के होते है | इसके फलों की गुणवत्ता उत्तम तथा भण्डारण क्षमता मध्यम है, इसके फलों में मिठास तथा खटास का अच्छा मिश्रण होता है जिससे यह अत्यंत स्वादिष्ट किस्म मानी जाती है | साथ में फलों की गुदे की मात्रा अधिक तथा गुठली पतली होती है और गुदे का रंग पीला होता है | इस किस्म के फल मध्यम मौसम में पककर तैयार होते है | बिहार में इसे मालदा नाम से भी जाना जाता है |

13. मलगोवा     

यह दक्षिण भारत की व्यावसायिक किस्म है, इसके फलों की विशेष गुणवत्ता के कारण यह आम प्रेमियों में काफी लोकप्रिय है | इसके फल बड़े तथा तिर्यक गोलाकार होते है, इसके फलों का रंग पीला तथा भण्डारण क्षमता अच्छी है यह देर में पकने वाली किस्म है |

14. मनकूराद

यह गोवा तथा रत्नागिरी की प्रसिद्द व्यावसायिक किस्म है, वर्षा ऋतू में इसके फलों की उपरी सतह पर काले धब्बे पड़ जाते है | इसके फल मध्यम एवं अंडाकार तथा पीले होते है, फल की गुणवत्ता तथा भण्डारण क्षमता साधारण है, यह मध्य मौसम में पकने वाली किस्म है |

15.नीलम

यह तमिलनाडु प्रान्त की प्रमुख किस्म है, अपनी अच्छी भण्डारण क्षमता के कारण विपणन के लिए यह आदर्श किस्म है | इसके फल मध्य तथा वक्र अंडाकार एवं केसरिया रंग लिए होते है | फल की गुणवत्ता तथा भण्डारण क्षमता सर्वोत्तम है, यह देर में पकने वाली किस्म है |

16.समरबहिश्त चौसा

आम के इस किस्म की उत्पत्ति उत्तरप्रदेश के हरदोई जनपद के संडीला नमक स्थान में एक तालुकेदार के बाग़ ने संयोगवश एक बीजू पेड़ के रूप में हुई | इसके विशिष्ट सुगंध एवं स्वाद के कारण इसको सामान्यतः भारत के उत्तरी क्षेत्र में उगाया जाता है, इसके फल देखने में बड़े तथा चपटे एवं अंडाकार होते है इसके फलों का रंग हल्का पीला होता है तथा गुणवत्ता अच्छी होती है | इसके फल मिठासयुक्त तथा रसीले होते है, इसकी भंरण क्षमता मध्यम है | आम की यह किस्म देर से पककर तैयार होती है, उत्तर भारत में निर्यात प्रोत्साहन में इस किस्म की अच्छी सम्भावनाये है |

17.सुवर्णरेखा

यह आंध्रप्रदेश के विशाखापत्तनम की व्यावसायिक किस्म है, इसे सुन्दरी, लाट सुन्दरी तथा चिन्न सुवर्णरेखा ले नाम से भी जाना जाता है इसका फल मध्यम तथा तिरछा एवं अंडाकार होता है | सीके फलों का रंग हल्के कैडमियम की तरह पिला तथा उपरी भाग लाल होता है, यह एक अगेती किस्म है | इसकी गुणवत्ता मध्यम तथा भण्डारण क्षमता अच्छी है |

18. वनराज

यह गुजरात के बड़ौदा जिले की प्रसिद्द किस्म है, इसका फल मध्यम आकार का एवं तिरछा अंडाकार होता है | इसका रंग गहरा क्रोम एवं उपरी भाग लाली लिए होता है, फलों की गुणवत्ता तथा भण्डारण क्षमता अच्छी होती है | यह मध्य मौसम में तैयार होने वाली किस्म है |

19.जरदालू

आम की यह किस्म बंगाल की मुर्शिदाबाद क्षेत्र में मुख्य रूप से उगाई जाती है, बिहार में भी यह किस्म प्रचलित है | इसका नामकरण जरदालू नामक एक शुष्क फल की तरह के आकर के कारण किया गया | इसके फल आकार में साधारण, गोलाकार लम्बे, सुनहरे पीले सुवास युक्त तथा अच्छी गुणवत्ता वाले होते है | फलों की भण्डारण क्षमता मध्यम होती है यह मध्य मौसम में पकने वाली किस्म है |

आम का उत्पादन, आम की खेती से

आम की खेती के लिए संकर किस्मे

1.आम्रपाली

आम की यह किस्म दो प्रसिद्द किस्मों, दशहरी तथा नीलम के संकरण से विकसित की गयी है, इस संकर के वृक्ष बौने होते है तथा नियमित रूप से फलन में आते है | परन्तु इसके फल देर से पकते है, इसके फल मध्यम आकर के एवं गुदा पिला लाल तथा स्वादिष्ट होता है | फलों की भण्डारण क्षमता अधिक होती है यह किस्म सघन बागवानी के लिए उपयुक्त है |

 एक हेक्टेयर भूमि में इस किस्म के 1600 पौधे समायोजित किये जा सकते है जो पांच साल के आयु के बाद 16 टन प्रति हेक्टेयर फल देने की क्षमता रखते है| ताजे खाने के अलावा, प्रसंस्करण उद्योग हेतु इस किस्म को व्यावसायिक स्तर पर प्रोत्साहित किये जाने की असीम सम्भावनाये है|

2.मल्लिका

आम की यह संकर किस्म नीलम और दशहरी के संस्करण से विकसित की गयी है | इसके फल मध्यम बड़े तथा आयताकार होते है, फलों में गुदे की मात्रा काफी होती है तथा गुठली पतली होती है पके फलों का रंग पीला होता है | इसके फलों की गुणवत्ता तथा भण्डारण क्षमता अच्छी है, यह देर से तैयार होने वाली किस्म है | आंध्रप्रदेश, कर्नाटक आदि राज्यों में इसकी व्यावसायिक खेती बढ़ रही है, यह किस्म प्रसंस्करण (स्लाइस) के लिए उपयुक्त है | इसके अलावा इसके फलों के निर्यात की भी अच्छी सम्भावना है |

3.अरका अरुन

आम की इस संकर किस्म को बैंगनपल्ली और अल्फ़ान्सो के संस्करण से विकसित किया गया है, यह किस्म बौनी सघन बागवानी हेतु उपयुक्त, नियमित फल देने वाली तथा ‘स्पांजी टिशु’ नामक विकार से मुक्त होती है|

4.अरका पुनीत

यह संकर किस्म अल्फ़ान्सो और बैंगनपल्ली के संकरण से विकसित की गयी है | इसके फल मध्यम, आकर्षक तथा लाल आभा लिए होता है, इसकी भण्डारण क्षमता बहुत अच्छी है तथा यह ‘स्पोंजी टिशु’ नामक विकार से मुक्त होता है |

5.अरका नील किरण

इस संकर किस्म को अल्फ़ान्सो और नीलम के संकरण से विकसित किया गया है | यह नियमित फलन देने वाली तथा देर से पकने वालो किस्म है, इसके फल मध्यम आकार के, आकर्षक रंग वाले ‘स्पोंजी टिशु’ नामक विकार से मुक्त होता है |

6.रत्ना

 यह संकर किस्म नीलम और अल्फ़ान्सो के संकरण से विकसित की गयी है | इसके पेड़ो का आकार मध्यम तथा फलों का रंग आकर्षक होता है ‘स्पोंजी टिशु’ नामक विकार से मुक्त होता है |

7. सिन्धु

आम की यह किस्म रत्ना और अल्फ़ान्सो के संकरण से विकसित की गयी है यह नियमित फलन, शीघ्र परिपक्व होने वाली तथा छोटी गुठली वाली एवं ‘स्पांजी टिशु’ से मुक्त किस्म है

8.अउ रूमानी

यह किस्म रूमानी और मलगोवा के संकरण से तैयार की गयी है, यह बौनी तथा अधिक फल देने वालो किस्म है | इसके फलों का रंह पिला तथा आकार बड़ा होता है |

9.मंजीरा

यह संकर किस्म रूमानी तथा नीलम के संकरण से तैयार की गयी है, यह बौनी तथा अधिक फल देने वाली किस्म है इसके फलों का गुदा रेशा रहित एवं कड़ा होता है |

10.पी.के.एम-1

इस किस्म को चिन्न सुवर्णरेखा तथा नीलम के संकरण से तैयार किया गया है, यह नियमित फलन तथा अधिक उपज देने वाली किस्म है |

11. अम्बिका

यह किस्म आम्रपाली एवं जनार्दन पसंद के संकरण से प्राप्त हुई है, फल आकार में मध्यम तथा अंडाकार होते है | फलों का रंग पीला, आकर्षक तथा आभा युक्त होता है, यह नियमित फलन वाली तथा देर से पकने वाली किस्म है |

उपरोक्त के अतिरिक्त, अलफ़जली, सुन्दर लंगड़ा, सबरी जवाहर, नीलफान्सो, निलेशान, लिलेश्वरी व पी के एम-2 जैसी अन्य संकर किस्मे भी विकसित की गयी है |

प्रवर्धन

आम का प्रवर्धन, आम का बीज

आम का प्रवर्धन, कलम बंधन की विभिन्न विधिओं द्वारा किया जाता है, इसमें मूलवृन्त हेतु 6 माह से 1 वर्ष के आयु के बीज पौधे उपयुक्त होते है | उत्तर भारत की विशेषकर निजी पौधशालाओ में भेंट कलम बंधन (इनार्चिंग) द्वारा आम का प्रवर्धन व्यापक स्तर पर किया जाता है | इस विधि द्वारा प्रवर्धन में निम्न कमियां है :

  • सांकुर शाखाएं किशोरावस्था (juvenile phase) में रहती है, परिणाम स्वरुप ऐसे पौधों में 1-2 वर्ष विलम्ब से फलत की शुरुवात होती है |
  • मात्रिवृक्ष से सिमित संख्या में सांकुर शाखें उपलब्ध हो पाती है |
  • इस विधि से वांछित प्रजाति का प्रवर्धन बाहर से लाकर संभव नही है |

आम की खेती के लिए प्रवर्धन तकनीक

भेंट कलम बंधन की कामिओ को देखते हुए कलम बंधन की अन्य विधियो, जिनके द्वारा अन्य राज्यों में आम का प्रवर्धन सफलतापूर्वक किया जाता है, सुविधानुसार उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए आम के उच्च उत्पादकता वाले पौधों की मांग बढ़ने के कारण आवश्यकता इस बात की है की मात्रिवृक्ष से अधिकाधिक समय तक स्वस्थ शाखे उपलब्ध होती रहे तथा विभिन्न विधिओं और संरचनाओ तथा पालीहाउस, नेट हाउस आदि की सहायता से वर्ष में जिस समय संभावित हो नियमित रूप से प्रवर्धन चलता रहे

आम में निम्न विधिओं द्वारा प्रवर्धन किया जाता है

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1.विनियर कलम विधि

आम के प्रवर्धन की यह प्रमाणित विधि है जिसका मानकीकरण भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा किया गया था | उत्तर भारत में आम प्रवर्धन विशेषकर कृषि विश्वविद्यालय एवं शोध संस्थाओ में व्यापक स्तर पर किया जा रहा है जिसका details इस प्रकार है|

  • एक वर्ष आयु के स्वस्थ बीजू पौधे जिनका व्यास लगभग 10MM हो, को मूलवृन्त के रूप में प्रयोग किया जाता है|
  • शान्कुर शाख हेतु वांछित किस्म की 5-6 माह पुरानी स्वस्थ शाखें उपयोग में लायी जाती है |
  • शान्कुर शाख की पत्त्यियो (leaf lamina) को कलम बाँधने के 8-10 दिनों पूर्व डंठल छोडते हुए काट दिया जाता है |
  • मूलवृन्त में भूमि की सतह से 15-20 सेमी की ऊँचाई पर बगल में 3-4 सेमी तिरछा चिरा लगाया जाता है
  • चीरा के आधार पर एक छोटा चीरा (transverse cut) इस प्रकार लगाया जाता है की इसमें सांकुर शाख सुविधापूर्वक स्थापित की जा सके |
  • सांकुर शाखें जिसमे शीर्ष कलिका (apical bud) फुल (swell) गयी हो (परन्तु फूटने से पहले) मातृवृक्ष से प्रातः अथवा सांयकाल एकत्रिक कर ली जाती है, इस सांकुर शाखाओ को अख़बार में लपेट कर टाट के टुकड़े में रखकर पानी का ऊपर से छिड़काव कर नम बनाये रखते है |
  • सांकुर शाख के निचे के सिरे में मूलवृन्त के विपरीत दिशा में लगभग 3-4 सेमी का एक लम्बा चीरा इस प्रकार लगाते है की मूलवृन्त के बनाये स्थान के ऊपर लगाये चीरे में सांकुर शाख सुगमतापूर्वक बैठ जाये |
  • जब सांकुर शाख को मूलवृन्त में भलीभांति स्थापित कर, 200 गेज पोलीथिन पट्टी से अच्छी तरह कसकर बाँध देना चाहिए | इस प्रक्रिया के उपरांत मूलवृन्त के सबसे उपरी भाग को लगभग 10 सेमी से काट देते है |
  • उत्तर भारत में जुलाई से सितम्बर तक खुली क्यारियो तथा पालीहाउस की सुविधा उपलब्ध होने पर किसी भी समय आम प्रवर्धन इस विधि द्वारा सुगमतापूर्वक किया जा सकता है |इसके अलावा मार्च माह में भी इस विधि द्वारा पौधे बनाये जा सकते है|
  • शंकुर शाख में फुटाव होने पर मूलवृन्त की शीर्ष शाख को काट दिया जाता है, यह क्रिया दो बार में पूर्ण किया जाता है |
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2.प्रांकुर प्रवर्धन

यह सरल तथा कम समय में आम प्रवर्धन की विधि है, इसमें मूलवृन्त तथा सांकुर शाख कोमल होते है |अतः प्रवर्धन की प्रारंभिक अवस्था में उचित वातावरण, नमी एवं तापमान सुलभ रहने पर ही अच्छी सफलता मिल पाती है | कोंकन क्षेत्र में व्यावसायिक स्तर पे इस विधि द्वारा आम का प्रवर्धन किया जाता है |

  • मूलवृन्त हेतु 8-10 दिन आयु के अमोले (young seedlings) जिनमे ताम्रयुक्त पत्तियां हो, उपयोग किया जाता है |
  • अमोले को गुठली के साथ 0.1% बेविस्टीन में 5 मिनट तक उपचारित कर लिया जाता है|
  • अमोले के शीर्ष शाख 6-8 सेमी की ऊंचाई से काट दी जाती है तथा शीर्ष भाग के बीचो बीच 3-4 सेमी लम्बवत चीरा लगाया जाता है|
  • सांकुर शाख जो इन मूलवृन्त के व्यास के बराबर हो तथा जिन्हें पूर्ण वर्णित विनियर की भांति तैयार किया गया हो, प्रत्यारोपण आयु के हो, तब इसका प्रवर्धन किया जाता है |

3.कोमल शाख कलम बंधन

यह विनियर तथा प्रांकुर कलम बंधन के बिच की विधि है जिसे सफलतापूर्वक देश में आम प्रवर्धन में व्यावसायिक स्तर पर उपयोग किया जाना चाहिए | सर्वप्रथम इसका मानकीकरण गुजरात कृषि विश्वविद्यालय परिसर, आन्नद में किया गया था इस विधि द्वारा मार्च एवं जुलाई-अगस्त तक खुली क्यारिओं तथा पालीहाउस सुविधा होने पर लगभग वर्ष भर तक प्रवर्धन किया जा सकता है और आम की खेती अच्छी प्रकार से की जा सकती है इसका विवरण इस प्रकार है-

  • जब ताम्रयुक्त पत्तियन हल्की पिली हो रही हो तथा मूलवृन्त 6 माह से 1 साल तक आयु के हो तब इनका उपयोग प्रवर्धन के लिए किया जाता है |
  • मूलवृन्त खुली क्यारिओं अथवा व्यवस्था उपलब्ध होने पर पोलीथिन की थैलिओं में लगे जाता है |
  • विनियर की भांति ही सांकुर शाख को तैयार किया जाता है |
  • मूलवृन्त एवं सांकुर शाख एक ही मोटाई के चयन किए जाने चाहिए |
  • मूलवृन्त के शीर्ष पर कटे भाग से लगभग ४ सेमी का लम्बवत चीरा बीचो बिच निचे की ओर सावधानीपूर्वक लगाया जाता है
  • सांकुर शाख के आधार पर भी लगभग 4 सेमी तिरछी कटाई दोनों तरफ कलम की भांति की जाती है | सांकुर शाख का प्रत्यारोपण सावधानीपूर्वक मूलवृन्त पर कर दिया जाता है तथा यह ध्यान रखा जाता है की इस की यह ठीक ढंग से बैठ गया है | फिर 200 गेज मोटी पोलीथिन पट्टी से अच्छी तरह मिलाप को बांध दिया जाता है |
  • आवश्यकतानुसार आरोपित सांकुर शाख के ऊपर पतली पोलीथिन नलिका 10-15 दिनों तक (शीर्ष कलिका के फुटाव होने के पहले तक) आरोपित की जाती है |
  • शीर्ष कलिका के फुटाव के बाद नलिका हटा करदुसरे प्रवर्धितपौधे पर आरोपित की जा सकती है |
  • सुविधा उपलब्ध होने पर इन्हें एक से डेढ़ माह तक वातावरण में तथा इतने ही समय तक साधारण पालीहाउस में और बाद में नेट हाउस तथा खुली क्योरियों में स्थान्तरित करने के बाद पौधे रोपण हेतु तैयार हो जाते है |
  • इस विधि द्वारा स्वस्थानें (insitu) आम की बाग़ की स्थपना सम्भावित होती है

अनुभव के आधार पर विनियर, सांकुर तथा कोमल शाख कमल बंधन में “कोमल शाख कलम बंधन” आसान विधि है जिसे उत्तर भारत में व्यवसायिक स्तर पर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए |

आम की खेती के लिए बीजू पौधे तैयार करना

 बिजु पौधे, आम का अधिक उत्पादन

गुठली से उत्पन्न पौधों को मूलवृन्त के रूप में प्रयोग किया जाता है | बीजू पौधे तैयार करने के लिए आम की गुठलियों को जून-जुलाई माह में सड़ी गोबर की खाद (8-10 टन/हे.) से उपचारित क्योरियों में लगाया जाता है | सड़ी गोबर के खाद के विकल्प स्वरूप 24 किलो. नत्रजन प्रति हेक्टेयर (यूरिया, कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट या अन्य अकार्बनिक पदार्थ के रूप में) नये पौधों की पत्तियों में हरापन आने के बाद दो महीने के स्म्यानंतर पर दो बार में डाला जा सकता है |

बीजू पौधों को 2-3 महीने के उपरान्त पहले से तैयार क्योरियों में या पौलिथिन बैग में लगाना चाहिए तथा पौधों को एक स्थान से दुसरे स्थान पर रोपित करने की इस विधि में सिंचाई का पूरा ध्यान रखना चाहिए | इन छोटे पौधों को पाले से बचाने के लिए बड़े छायादार पेड़ों के निचे रखना चाहिए अथवा दिसम्बर–जनवरी माह में घास-फूस से ढक देना चाहिए |

सामान्यत: आम की किस्मो को तैयार करने के लिए किसी भी बीजू मूलवृन्त को ले लिया जाता है, परंतू ऐसा देखा गया है कि बहुभ्रुणीय मूलवृन्तों के प्रयोग से पेड़ों में बैनापन तथा जल्दी फल देने की प्रवित्ति विकसित होती है |

वृछारोपण

आम के पेड़ लगाने से पहले खेत को गहराई से जोत कर समतल कर लेना चाहिए | इसके पश्चात निश्चित दुरी पर उचित प्रकार के गड्ढे मई-जून माह में बनाकर उनमें गोबर की सड़ी खाद मिला देनी चाहिए | जिन किस्मो के पेड़ों को लगना है, उनके अच्छे पौधे मान्यता प्राप्त पौधशाला से कुछ दिन पहले लाकर रख देना चाहिए |

आम का पेड़ लगाने का समय

आम के पेड़ों को लगाने के लिए पुरे देश में वर्षाकाल उपयुक्त माना गया है, क्योंकि इन दिनों वातावरण में काफी नमी होती है | अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में आम के पेड़ वर्षा के अंत में तथा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में वर्षाकाल के प्रारम्भ में लगाने चाहिए जिससे पौधें अच्छी तरह स्थापित हो सकें | पेड़ लगाने का सबसे अच्छा समय सायंकाल होता है | दिन की गर्मी में पेड़ मुरझा जाते हैं | यदि आसमान बादलों से ढका हो तो दिन के समय भी पौधे लगाये जा सकते हैं |

पेड़ों की बीच की दूरी ( आम की खेती में )

आम के पेड़ों की बीच की दूरी आम की अलग-अलग किस्मों, भूमि की उपजाऊ पन तथा क्षेत्र में वांशपति वृधि पर निर्भर करती है | जिस भूमि पर पौधे तेजी से पढ़ते है वहाँ पौधों को 12X12 मी. की दूरी पर लगाना चाहिए | शुष्क भूमि या उस क्षेत्र पर जहाँ वृधि कम होती है 10X10 मी. दूरी प्रयाप्त होती है | आम्रपाली जो एक बैनी किस्म है, 2.5×2.5 मी. की दूरी पर लगाई जा सकती है | दशहरी प्रजाति सघन बागवानी के लिए पौधे से पौधे की दूरी 5×5 मी. उपयुक्त है |

गड्ढों का आकार

जहाँ पौधे लगाने हों वहाँ की भूमि यदि गहरी एवं दोमट हो तो 0.5 से 1 घन मी. के गड्ढे खोदने चाहिए परन्तु पहाड़ी क्षेत्र एवं छिछली भूमि में गड्ढों का आकार कम से कम 1x1x1 घन मी. होना चाहिए |

गड्ढों की भराई

गड्ढों को खोदते समय ऊपर की 30 सेमी. मिट्टीएक तरह और निचे की70 सेमी.मिट्टीदूसरी तरह रखनी चाहिए | गड्ढे भरते समय सर्वप्रथम ऊपर 70 सेमी. वाली मिट्टी भरनी चाहिए | उसके पश्चात लगभग 50 किलो. ग्राम सड़ी गोबर की खाद निचे की 70 सेमी. वाली मिट्टी में अच्छी तरह मिलाकर भरना चाहिए | अगर मिट्टी में दीमक की समस्या हो तो 100 ग्राम क्लोरपाईरीफॉस पाउडर प्रति गड्ढे के दर से खाद मिलाते समय डालना चाहिए |

यदि भूमि पथरीली हो तो खुदी मिट्टी से कंकड़-पत्थर निकाल देना चाहिए और गोबर की खाद सड़ी को मिला कर गड्ढों को भरना चाहिए |  गड्ढे भरते समय इन्हें खेत की सतह से थोड़ा ऊचा भरना चाहिए ताकि वर्षा के पश्चात् भी गड्ढे और खेत की सतह बराबर रहे | गड्ढों की खुदाई या भराई का कार्य मानसून से पहले मई-जून माह में अवश्य क्र लेना चाहिए

इन गड्ढों के स्थान पर खूंटी गाड़ देना चाहिए जिसके बाद में गड्ढे की पहचान हो सके | मानसून के अभाव में खाद एवं मिट्टी से भरे हुए गड्ढे में पौधे रोपण के 3-4 दिन सिचाईं करना अति आवश्यक होता है

आम की खेती के लिए पौध रोपण

आम की खेती में बाग लगाने हेतु पौधालय से लाये जाने वाले पौधों को भूमि को मिट्टी समेत (पिण्डी)चारों ओरसे अच्छी प्रकार से खोद कर निकलना चाहिए, जिससे जड़ों को कम से कम हानिं पहुंचे | इसके बाद पौधों को पूर्व चिन्हित गड्ढों के बीचो-बीच पिण्डी के बराबर गड्ढा खोदकर और फिर उसमे पौधों को रखकर चारों ओर से मिट्टी अँगुलियों से दबाकर भर देनी चाहिए |

पेड़ों को बिल्कुल सीधी पंक्ति में लगाने के लिए प्लांटिंगबोर्ड का प्रयोग करना चाहिए | पौधे लगाने के बाद उसके चरों ओर सिंचाई करने हेतु 60 सेमी. गोलाकार थाले (बेसिन) बना देने चाहिए | पेड़ लगाते समय इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि ना तो पौधा जमीन में इतना निचे चले जाय कि कलम बंधा भाग भी अंदर हो जाये और ना ही इतना ऊपर हो कि पौधे जड़ें दें | पौधे लगाने के बाद थाले में सिंचाई कर देनी चाहिए |

कटाई एवं छंटाई ( आम की खेती में )

आरम्भ से पौधे को एक निश्चित आकार देने के लिए कटाई-छंटाई अवश्यक है | यदि पेड़ की शखाएँ अधिक निचाई से निकल रही हों तो उसकी छंटाई आवश्यक है | मुख्य तने के 75-100 सेमी. ऊचाई तक शखाएँ नहीं निकलना देना चाहिए और अलग-अलग दिशाओं में मुख्य शाखाओं के बीच में 20 से 25 सेमी. का अंतर होना चाहिए एसी शाखाएं जो आपस में आर-पार जा रही हों, काट देनी चाहिए |

 लेकिन इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कटाई उस अवस्था में ही कि जाए जब शाखाएं (पेंशील) बराबर मोटाई की हों क्योंकि बाद की कटाई से पेड़ को हानिं हो सकती है | शाखाये एक दूसरे के निकट होने पर सूर्य के प्रकाश की पौधों में कमी हो सकती है जिससे फलन प्रभावित हो सकती है |

पोषण ( आम की खेती में )

आम का रोपण से उगे आम

भूमि के बड़े हिस्से से पोषण प्राप्त करने की क्षमता के कारण आम के पेड़ को कम उपजाऊ भूमि में भी उगाना सम्भव है परन्तु पोषक तत्वों की आवश्यकता उत्पादकता बढ़ाने एवं मिट्टी के उपजाऊपन को सुरक्षित रखने में तथा पौधों को स्वस्थ रखने हेतु आवश्यक है | पेड़ में खाद की आवश्यकता भूमि की उर्वरकता व पौधों की उम्र पर निर्भर करती है |

 इस प्रकार अलग-अलग प्रकार के भूमि में खाद या पोषक तत्व की मात्रा भी अलग-अलग होती है | पेड़ों को खाद देने से प्रति वर्ष गुणावत्तायुक्त अच्छे फलन की सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं | उर्वरक देने की आवश्यकता के सम्भन्ध में तक हुए अनुसंधानों एवं बागवानों के अनुभवों के आधार पर उर्वरकों अनुमोदित प्रकार निन्म है |

आम की खेती के लिए उर्वरक की मात्रा

आम में पोषक तत्वों का प्रबन्धन पौध लगाने के समय से ही शुरू हो जाता है | पौधे लगाते समय गड्ढों में खाद प्रयोग के बारे में पूर्व में बताया जा चूका है | पौधे लगाने के बाद लगभग एक वर्ष तक खाद डालने की आवश्यकता नहीं होती तत्पश्चात प्रति वर्ष 100 ग्राम नत्रजन (217 ग्राम यूरिया), 50 ग्राम फास्फोरस (312 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट) एवं 100 ग्राम पोटाश (167 ग्राम म्यूरेट आफ पोटाश) प्रति पेड़ डालना चाहिए |

खाद की यह मात्रा प्रति वर्ष के गुणान के अनुपात में 10 वर्ष तक बढ़ाते जाना चाहिए | इस प्रकार 10 वर्ष के पेड़ को प्रति वर्ष मिलने वाली उर्वरक की मात्रा 1 किलो ग्राम नत्रजन (किलो ग्राम यूरिया), 500 ग्राम फास्फोरस (312 किलो ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट) एवं 1 किलो ग्राम पोटाश (1.67 किलो ग्राम म्यूरेट आफ पोटाश) होगी |

दस वर्ष से अधिक आयु के वृक्षों में भी यही मात्रा डालते रहना चाहिए, इसके अलावा भूमि के भौतिक गुण एवं अन्य लाभप्रद परिणाम हेतु प्रति वर्ष उचित मात्रा में गोबर की सड़ी खाद (20-30 किलोग्राम) डालनी चाहिए | तने से दुरी 1.5 मीटर दुरी पर बनी नालियों में खादों का प्रयोग करना चाहिए | शुक्ष्म तत्वों का नियमित रूप से प्रयोग आवश्यक नहीं है, परन्तु इनकी कमी की अवस्था में इसका मृदा में उपयोग तथा पर्णीय छिड़काव करना चाहिए|

फलों की गुणवत्ता में वृद्धि के लिए 3 प्रतिशत पोटेशियम नाइट्रेट का पर्णीय छिड़काव लाभप्रद होता है, इसके अलावा 40 किलोग्राम गोबर की खाद के साथ 250 ग्राम एजोस्पिरीलम (जैविक खाद) मिला कर जुलाई-अगस्त में थालों में प्रयोग से उत्पादन में सार्थक वृद्धि पायी गयी है |

उर्वरक प्रयोग का सही समय ( आम की खेती में )

उर्वरक का प्रयोग एक बार में ही करना चाहिए, इसका पूर्ण भाग फल तोड़ने के तुरंत बाद (जुलाई) में डालना चाहिए| रासायनिक खादों का प्रयोग मिटटी में उचित नमी की अवस्था में ही करना चाहिए, अगर मिटटी सुखी है, तो हल्की सिंचाई करने के उपरांत ही उर्वरक डालना चाहिए |

आम की अधिक खेती के लिए उर्वरक प्रयोग विधि

उर्वरक डालने के पूर्व पेड़ के थाले से खरपतवार निकाल देने चाहिए, छोटे पौधे में ताने के आस-पास थोड़ी दुरी छोड़कर उर्वरको एवं खादों को भूमि में डालकर अच्छी तरह मिला देना चाहिए | इसी प्रकार बड़े पौधों में तने से 1.5 मीटर की दुरी पर नाली (30 सेमी चौड़ी एवं 20-25 सेमी गहरी) बनाकर प्रयोग करना चाहिए |

आम की खेती में सिंचाई

आम में आवश्यक पानी की मात्रा व अन्तराल, मृदा, जलवायु (मुख्यतः तापमान एवं वर्षा) एवं पौधों की उम्र पर निर्भर करती है, मानसून में सिंचाई की आवश्यकता अधिक नहीं होती है | नियमित सिंचाई की आवश्यकता गर्मी में अधिक होती है, गर्मी के मौसम में पौधा लगाने के प्रथम वर्ष में जब पौधें छोटे हो और उनकी जड़ो का पूर्ण विकास नही हुआ रहता है उस समय 2-3 दिनों के अन्तराल पर सिंचाई करना आवश्यक रहता है

2-5 वर्ष के पौधों को 4-5 दिनो के अंतर एवं 5-8 वर्ष की उम्र के पौधों को 10-15 दिनों के अंतर पर पानी देना चाहिये वृक्षों के पूर्ण फलन अवस्था में फल लगने के उपरांत 2-3 सिंचाई आवश्यक है | बौर आने के 2-3 माह पहले बाग़ की सिंचाई नहीं करनी चाहिए, साधारणतया अन्तः फसलें बाग़ के प्रारंभिक वर्षो में ली जाती है |ऐसे बागों में सिंचाई व्यवस्था अन्तः फसलों को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए |


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