कद्दू की खेती

(नये तरीके से) कद्दू की खेती में है अधिक मुनाफा कैसे करें आइये जानते है |

शेयर करें

कद्दू की खेती – परिचय

कद्दू की खेती मुख्य रूप से उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, असम, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरला तथा उत्तरांचल में की जाती है, इसका कच्चा फल सब्जी बनाने के लिए, इससे च्यवनप्राश भी बनाया जाता है जिसके खाने से दिमाग के साथ साथ स्मरण क्षमता में भी बढ़ोतरी होती है इसके पके फलों के गुदो में मसाला मिलाकर बरी एवं तिलौरी बनाई जाती है, जिसका भण्डारण आसानी से करके सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है |

कद्दू की खेती के लिए जलवायु

गर्म और अधिक आद्रता वाले क्षेत्र इसकी खेती के लिए सर्वोत्तम है, बीज के जमाव और पौधों की बढ़वार के लिए 25-27 डिग्री सेल्सियस तापमान अच्छा होता है, बुवाई के समय तापमान 18-20 डिग्री सेल्सियस होने से अंकुरण एक सप्ताह में हो जाता है | फूलों के आने के समय अधिक वर्षा होने से फलत कम हो जाती है |

भूमि

अच्छी जल निकास व जीवांशयुक्त बलुई दोमट मिट्टी इसके लिए सर्वोत्तम पायी गयी है, बुवाई से पूर्व चार पांच बार हल चलाकर खेत को अच्छी तरह तैयार कर लिया जाता है |

कद्दू की खेती के लिए उन्नत किस्मे

कद्दू के फल
कद्दू की kheti

काशी धवल :-

इसकी बुवाई अप्रैल से लेकर जुलाई के प्रथम सप्ताह तक की जा सकती है, इसका फल बेलनाकार, गुदा सफ़ेद, गुदे की मोटाई औसतन 8.5 सेमी एवं फल का औसतन वजन 12 किलोग्राम होता है | फल का लम्बवत आकार 90 सेमी और गोलाई 80 सेमी तक हो जाती है |

एक पौधे में 2-3 फल लगते है जिनकी तुड़ाई 100-105 दिनों में की जा सकती है, इस प्रजाति के लता की लम्बाई 7-8 मीटर तक होती है एवं मादा फुल शुरुआत से 22-24 गांठो के अंतर पर प्रारंभ होते है | फल को तुड़ाई उपरांत सामान्य तापक्रम एवं सूखे स्थान पर लगभग 4-5 महीनो तक भण्डारित कर सकते है |

फल ने गुदा अधिक होने के कारण यह पेठा बनाने हेतु सर्वोत्तम है, इस प्रजाति का औसत उत्पादन 60 टन प्रति हेक्टेयर तक आसानी से प्राप्त किया जा सकता है | यह प्रजाति उत्तरप्रदेश, पंजाब एवं बिहार के किसानो के बीच अधिक प्रचलित है |

काशी उज्जवल :-

इस प्रजाति की बुवाई अप्रैल के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक कर सकते है, फल गोल गुदे की औसत मोटाई 7 सेमी. एवं फल का वजन 10-12 किलोग्राम होता है | एक पौधे लगते है यह प्रजाति पेठा एवं बरी बनाने के लिए उत्तम है इसकी उत्पादन क्षमता 55-60 टन प्रति हेक्टेयर है |

इसका फल बीज बुवाई के 110-120 दिनों के बाद तुड़ाई करने लायक हो जाता है, फल को सामान्य तापक्रम में 4-5 महीने तक सुखा एवं छायादार स्थान पर भण्डारित करते है इस प्रजाति को पंजाब, बिहार, उत्तरप्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, तमिलनाडु एवं केरल के लिए अनुमोदित किया गया है | यह कद्दू की प्रथम प्रजाति है जिसका अनुमोदन अखिल भारतीय स्तर पर किया गया है |

काशी सुरभि :-

इसकी बुवाई अप्रैल से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक कर सकते है, इस प्रजाति का फल लम्बवत, गुदे की औसतन मोटाई 6-7 सेमी. और फल का वजन 9.5-10 किलोग्राम होता है | एक पौधे में औसतन 3-4 फुल लगते है यह प्रजाति पेठा एवं बरी बनाने हेतु उत्तम है | इसकी उत्पादन क्षमता 60-70 टन प्रति हेक्टेयर है |

कद्दू की खेती
कद्दू

खाद एवं उर्वरक

कद्दू की फसल में 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 220 किलोग्राम यूरिया, 60 किलोग्राम फास्फोरस, तथा 60 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए | रासायनिक उर्वरको में नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा खेत में नालियाँ या थाले बनाते समय देते है | नाइट्रोजन की शेष मात्रा दो बराबर भागों में बाँट कर खड़ी फसल में जड़ो के पास बुवाई के 20 तथा 40 दिनों बाद देते है |

यदि बोवाई गड्ढे में कर रहे हो तो प्रति गड्ढा 3 किलो सड़ी गोबर 50 किलोग्राम यूरिया, 40 किलोग्राम फास्फोरस तथा 40 किलोग्राम पोटाश को बोवाई के तीन दिन पहले मिला देना चाहिए |

कद्दू की खेती में बुवाई का सही समय

मुख्य फसल के रूप में कद्दू की बुवाई जून के दुसरे पखवाड़े में करते है, उत्तर के मैदानी भागो में जहाँ सिंचाई की उचित व्यवस्था हो वहां पर इसकी बुवाई अप्रैल के प्रथम सप्ताह में की जा सकती है, दक्षिण भारत में इसकी बुवाई जून से लेकर अगस्त तक करते है | जबकि उत्तर भारत के पर्वतीय भागो में इसकी बुवाई अप्रैल-मई में की जाती है |

बीज की मात्रा

कद्दू की किस्म
कद्दू के किस्म

यदि एक स्थान पर दो तीन बीज बोये जाते है तो प्रति हेक्टेयर 3.0 से 3.5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है, 150 ग्राम वजन में लगभग 2000 बीज होते है |

बुवाई की विधि

अच्छी तरह से तैयार खेत में 4 मीटर की दुरी पर मेढ़ बना लेते है, मेढ़ो पर 80 सेमी. की दुरी पर बीज बोने के लिए निशान बना लेते है तथा एक गड्ढे में 2-3 बीजो की बुवाई करते है |

कद्दू की खेती में सिंचाई

बीज की बुवाई खेत में नमी की पर्याप्त मात्रा रहने पर ही करनी चाहिए जिससे बीजों का अंकुरण एवं वृद्धि अच्छी प्रकार हो, बरसात वाली फसल के लिए सिंचाई की विशेष आवश्यकता नही पड़ती है | गर्मी की फसल को पांच दिन के अन्तराल में सिंचाई की जानी चाहिए, तने की वृद्धि, फुल आने के समय तथा फल की बढ़वार के वक्त पानी की कमी नही होनी चाहिए |

खरपतवार नियंत्रण एवं निराई-गुड़ाई

वर्षाकालीन फसल में खरपतवार की समस्या अधिक होती है, जमाव से लेकर प्रथम 25 दिनों तक खरपतवार फसल को ज्यादा नुकसान पहुंचाते है | इससे फसल की वृद्धि पर प्रतिकूल असर पड़ता है तथा पौधे की बढ़वार रुक जाती है, अतः खेत से समय समय पर खरपतवार निकालते रहना चाहिए |

रासायनिक खरपतवार नाशी के रूप में स्टाम्प रसायन 3 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव बुवाई के तुरंत बाद करते है, खेत से पहली बार खरपतवार बुवाई के 20-25 दिनों के अन्दर निकाल देते है | खरपतवार निकालने के बाद खेत की गुड़ाई करके जड़ों के पास मिट्टी चढ़ाना चाहिए जिससे पौधों का विकास तेजी से होता है |

कद्दू की खेती में प्रमुख किट एवं नियंत्रण

कद्दू का लाल किट (red pumpkin beetle)

इस किट की सुंडी जमीन के अन्दर पायी जाती है, इसकी सुंडी व वयस्क दोनों क्षति पहुंचाते है, प्रौढ़ पौधों की छोटी पत्तियों पर ज्यादा क्षति पहुंचाते है | ग्रब(इल्ली) जमीन में रहती है जो पौधों की जड़ पर आक्रमण कर हानि पहुंचती है |

यह किट जनवरी से मार्च के महीनो में सबसे अधिक सक्रीय होते है, अक्टूबर तक खेत में इनका प्रकोप रहता है | फसलों के बीज पत्र एवं 4-5 पत्ती अवस्था इन कीटों के आक्रमण के लिए सबसे अनुकूल है प्रौढ़ किट विशेषकर मुलायम पत्तियां अधिक पसंद करते है | अधिक आक्रमण होने से पौधें पत्ती रहित हो जाते है, सुबह ओस पड़ने के समय राख का भुरकाव करने से भी प्रौढ़ पौधा पर नही बैठता जिससे नुकसान कम होता है |

जैविक विधि से नियंत्रण के लिए एजाडीरेकटिन 300PPM 5-10 ml/लीटर  या 5% 0.5ml/लीटर की दर से दो या तीन छिड़काव करने से लाभ होता है, इस किट का अधिक प्रकोप होने पर कीटनाशी जैसे डाईक्लोरोवाश 76 ई.सी., 1.25ml/लीटर या ट्राईक्लोफेरान 50 ई.सी., 1ml/लीटर की दर से जमाव के तुरंत बाद एवं दुबारा 10वें दिन पर पर्णीय छिड़काव करें |

फल मक्खी –

इस किट की सुंडी हानिकारक होती है, प्रौढ़ मादा छोटे, मुलायम फलों के छिलके के अन्दर अंडा देना पसंद करती है, और अंडे से ग्रब(सूडी) निकलकर फलों के अन्दर का भाग खाकर नष्ट कर देते है | किट फल के जिस भाग पर अंडा देती है वह भाग वहां से टेढ़ा होकर सड़ जाता है, ग्रसित फल सड़ जाता है और निचे गिर जाता है |

गर्मी में खेत की गहरी जुताई करे ताकि मिट्टी की निचली परत खुल जाए जिससे फल मक्खी का प्यूपा धुप द्वारा नष्ट हो जाए तथा शिकारी पक्षियों द्वारा खा लिया जाता है, ग्रसित फलों को इकठ्ठा करके नष्ट कर देना चाहिए |

नर फल मक्खी को नष्ट करने के लिए प्लास्टिक की बोतलों को इथेनाल, कीटनाशक (डाईक्लोरोवासया मैलाथियान), क्युल्युर को 6:1:2 के अनुपात के घोल में लकड़ी के टुकड़ो को डुबाकर 25-30 फंदा खेत में स्थापित कर देना चाहिए |

कार्बारील 50WP. 2 ग्राम/लीटर या मैलाथियान 50ईसी 2ml/लीटर पानी को लेकर 10% शिरा अथवा गुड़ में मिलाकर जहरीले चारे को 250 जगहों पर 1 हेक्टेयर खेत में उपयोग करना चाहिए, प्रतिकर्षि 4% नीम की खली का प्रयोग करें जिससे जहरीले चारे की ट्रैपींग की क्षमता बढ़ जाए आवश्यकतानुसार कीटनाशी जैसे क्लोरनेट्रानिलीप्रोल 18.5 एससी. 0.25ml/लीटर या डाईक्लारोवास 76 ईसी. 1.25ml/लीटर पानी की दर से भी छिड़काव कर सकते है |

kaddu ki kheti
कद्दू की उन्नत खेती

प्रमुख रोग एवं नियंत्रण

एन्थ्रेक्नोज :

इस रोग का प्रकोप वर्षाकालीन फसल में अधिक होता है, इस बीमारी में छोटे-छोटे भूरे धब्बे पत्तियों तथा टहनियों पर दिखाई देते है, टहनी पर नारंगी रंग के धब्बे दिखाई देते है तथा पत्तियां बड़ी तेजी से सूखने लगती है इसकी रोकथाम के लिए हेक्साकोनाजोल 1 ग्राम/लीटर या प्रोपिकोनाजोल 1 ml/लीटर पानी का घोल का बनाकर छिड़काव करने से रोग का अच्छी तरह से नियंत्रण हो जाता है |

फल सड़न :

फल सड़न के लिए कई फफूंद जिम्मेदार है जैसे- पिथियम, राइजोकटोनिया, स्केलोरोटियम, मोक्रोफोमिना तथा फ़ाइटोप्थोरा | मुख्य रूप से ये सारे फफूंद मिट्टी से आते है, यह रोग उन फलों पर ज्यादा होता है जो मिट्टी में सटे होते है इसलिए कद्दू के फसलों को समय समय पर एक तरफ से दुसरे तरफ पलटते रहना चाहिए तथा खेत में जल निकास का उचित प्रबंध करना चाहिए | वैलिडामाइसिन का 2ml/लीटर या टेबुकोनाजोल 1ml/लीटर पानी के साथ 10-12 दिन के अन्तराल पर दो बार मृदा सिंचन करें |

तुड़ाई एवं उपज

सब्जी के रूप में प्रयोग करने के लिए तुड़ाई फुल खिलने के 10 दिनों के अन्दर करते है अगर मिठाई बनाना है तो पके हुए फल को तोड़े पके ही कद्दू में सफ़ेद पाउडर जम जाता है तथा फल चिकना दीखता है | अच्छी देखभाल करने पर औसत उपज लगभग 55-65 टन प्रति हेक्टेयर होती है |

कद्दू की खेती की विडियो

शेयर करें

headdead05@gmail.com

नमस्ते किसान भाइयो, मेरा नाम अनिल है और मै इस वेबसाइट का लेखक और साथ ही साथ सह-संस्थापक भी हूँ, Education की बात करें तो मै graduate हूँ, मुझे किसानो और ग्रामीणों की मदद करना अच्छा लगता है इसलिए मैंने आप लोगो की मदद के लिये इस वेबसाइट का आरम्भ किया है आप हमे सहयोग देते रहिये हम आपके लिए नयी-नयी जानकारी लाते रहेंगे | #DIGITAL INDIA

View all posts by headdead05@gmail.com →

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *